डिजिटल मीडिया को कला संस्कृति का तोहफा “कलावंत”

इतिहास गवाह है कला संस्कृति को अनदेखा करने वालों का इतिहास दफ्न हो गया। उनका मर्म, बौद्धिकता,संवेदनाएं, अतीत, सृजनात्मकता, स्वतंत्रता और रचनाधर्मिता कुंद हो गई। अपनी कला-संस्कृति की सेवा-सम्मान और संरक्षण देने वालों को दुनिया ने सलाम किया है। सियासत, सरकार, खेल, विज्ञान, व्यापार, मीडिया, धर्म-आध्यात्म और भारतीय सिविल सेवाओं के क्षेत्र में कला-संस्कृति के सेवकों की भरमार है।
देश की आजादी में देश भक्ति के तरानों और नुक्कड़ नाटकों की अहम भूमिका थी। आजाद भारत की आन-बान,शान,ख्याति और प्रसिद्धी बढ़ाने में कला जगत का बहुत बड़ा योगदान रहा।
मीडिया की बात की जाए तो भारत में डेढ़ सौ साल पुरानी अखबारी मीडिया ने भारतीय कला संस्कृति को खूब स्थान दिया, और इसके सौंदर्य ने कागजी मीडिया को निखारा, सजाया-संवारा और बड़ा पाठक वर्ग दिया। तमाम कलाकार, साहित्यकार, कलमकार और ललित कलाओं के हुनरमंद सहाफत के पेशे से जुड़े और उन्होंने सांस्कृतिक संवाददाता से लेकर बड़े-बड़े पत्र पत्रिकाओं का संपादन किया।
दूरदर्शन और आकाशवाणी ने कला के संरक्षण और संवर्धन में बड़ा योगदान दिया, खासकर संगीत, नाटक जैसी कलाओं ने रेडियो-टीवी को खूब ऊंचाईयों पर पहुंचाया।
सैटेलाइट चैनलों ने भारतीय संस्कृति को अनदेखा किया, नतीजतन तीन-चार दशक की अल्प आयु में टीवी मीडिया लड़खड़ा गई और उसपर डिजिटल मीडिया हावी हो गया।
आज भारतीय संस्कृति को डिजिटल मीडिया में स्थान देने के लिए कला विद्वानों को आगे आना होगा। कला समीक्षकों को नये भारत में उभरते हुए इस तकनीकी मीडिया प्लेटफार्म से भारतीय कलाओं से दुनिया को रूबरू करने की जरूरत है।
ऐसी एक पहल की है यूपी के विख्यात कला समीक्षक और दैनिक जागरण,हिन्दुस्तान, अमर उजाला जैसे देश के ब्रॉन्ड अखबारों में लम्बी सेवाएं दे चुके वरिष्ठ पत्रकार आलोक पराड़कर ने।
हिंदी पत्रकारिता के पुरोधा और महान संपादक बाबूराव विष्णु पराड़कर के पौत्र आलोक पराड़कर की “कलावंत” वीडिया पत्रिका इन दिनों काफी चर्चा मे है।
उत्तर प्रदेश सहित देश के किसी भी कोने की सांस्कृतिक गतिविधियों की समीक्षात्मक कवरेज इस डिजिटल वीडियो पत्रिका को अलग पहचान दिला रही है। खासकर भारतीय संगीत और रंगमंच की नाट्य प्रस्तुतियों की कवरेज के साथ कला विद्वानों और कला रसिकों की राय-मशवरों को ही कलावंत में शामिल किया जा रहा है।
यूट्यूब पर खूब सर्च की जा रही इस वीडियो पत्रिका के अब तक कई अंक आ चुके है। शाम-ए-अवध और सुबह-ए-बनारस की खूबियों के लिए विश्वभर में मशहूर लखनऊ और वाराणसी के सांस्कृतिक कार्यक्रमों को कलावंत ने अपने दामन मे समेटा है। संगीत और रंगमंच जगत की विभिन्न हस्तियों द्वारा प्रस्तुतियों की समीक्षात्मक टिप्पणियों की बाइट पत्रिका को प्रभावशाली बनाती है और एकरूपता की नीरसता को तोड़ती है।
कलावंत को केवल लखनऊ और बनारस तक सीमित रखने की जगह इसे एक राष्ट्रव्यापी रूप देने का प्रयास है। इसीलिए इसकी शुरूआत जयपुर के निकट टोंक में राजकुमार रजक द्वारा व्यक्तिगत प्रयासों से किए जा रहे रंगकर्म से हुई थी। कलावंत की नवीनतम आठवीं कड़ी में प्रयागराज के मुट्टीगंज के एक मकान में चलने वाले स्टूडियो थिएटर को दर्शाया गया है जो उन रंगकर्मियों की शरणस्थली है जिनकी जेब में पैसे नहीं है लेकिन रंगकर्म का जुनून है। महंगे प्रेक्षागृहों और उनकी जटिल अनुमति की प्रक्रिया का विरोध इसमें दर्ज है।
हर पखवारे की अपनी कड़ियों में कलावंत ने पुणे, जयपुर, दिल्ली, टोंक, बरेली, प्रयागराज, वाराणसी, गोरखपुर, पौड़ी गढ़वाल सहित विभिन्न नगरों की सांस्कृतिक गतिविधियों को स्थान देने का प्रयास किया है। केवल गतिविधियों की जानकारी देने की जगह उन पर समीक्षात्मक टिप्पणी को भी शामिल किया जाता है।
पांचवी कड़ी में वरिष्ठ रंगकर्मी सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ के साक्षात्कार को शामिल किया गया था जिसकी काफी चर्चा रही। रंगकर्म की आर्थिक चिंता को उन्होंने बहुत ही प्रभावी ढंग से व्यक्त किया और कई चुभते सवाल उठाए। इसी प्रकार प्रसिद्ध छायाकार अनिल रिसाल सिंह पर केंद्रित कार्यक्रम भी काफी पसंद किया
वर्तमान पखवाड़े में प्रसारित कड़ी के साथ कलावंत के कुल आठ अंक अभी तक आ चुके हैं। कलावंत का शीर्षक संगीत प्रसिद्ध मोहनवीणा वादक पंडित विश्वमोहन भट्ट ने बनाया है जबकि पार्श्वसंगीत प्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित नित्यानंद हल्दीपुर एवं प्रसिद्ध संतूर वादक पंडित तरुण भट्टाचार्य का है। कलावंत के वीडियो संपादन का कार्य जयपुर के देवेंद्र योगी द्वारा किया जाता है, जबकि इसकी एंकर युवा कथक नृत्यांगना गौरी शर्मा हैं। वॉयस ओवर में जैनेंद्र एवं अभिनव अरुण का मुख्य स्वर होता है। परामर्श डॉ.रश्मि चतुर्वेदी, उषा पाठक बापट, अनिल नारायण शर्मा एवं डॉ मीनू पाठक शर्मा का है। सहायक निर्देशन अन्वीक्षा और कनक मिश्र का है।
बेहतर होगा कि भारतीय कलाओं की बदहाली, रोजी-रोटी और काम को मोहताज काबिल कलाकारों की मुफलिसी और लुप्त होती कलाओं को भी इसमें स्थान देकर पत्रकारिता का धर्म और बाबूराव विष्णु पराड़कर जी के आदर्शों का पालन किया जाए।
भारतीय कलाओं,कलाकारों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की अनदेखी करती सरकारों को उनकी जिम्मेदारी याद दिलाई जाए। यदि कही सरकारी प्रोत्साहन मिला है तो इसकी प्रशंसा भी हो।
सरकारी प्रेक्षागृहों के बढ़ते किराए और पुलिस प्रशासन की परमीशन की जटिलताओं को लेकर भी आवाज उठाए ‘कलावंत’।
दुनियाभर के दायरे में फैली डिजिटल/यूट्यूब मीडिया को भी कलावंत जैसी पत्रिका की जरूरत थी,ताकि विजुअल वैल्यू के साथ भारतीय कलाएं दुनियां के उन कोनों तक पहुंचती रहे जहां इन कलाओं के करोड़ों कद्रदान बैठे हैं।
नवेद शिकोह