‘महिलाओं का सार्वजनिक स्थानों पर आना भयंकर विनाश लाएगा’: केरल के प्रमुख इस्लामिक स्कॉलर के कट्टरपंथी फरमान से मचा सामाजिक बवाल

सरिता त्रिपाठी
तिरुवनंतपुरम
भारत के सबसे साक्षर और प्रगतिशील राज्य माने जाने वाले केरल में एक बेहद चौंकाने वाला और कट्टरपंथी फरमान सामने आया है, जिसने पूरे राज्य में मानवाधिकारों, महिला स्वतंत्रता और धार्मिक रूढ़िवादिता को लेकर एक गहरी सामाजिक बहस छेड़ दी है। केरल के एक प्रमुख और प्रभावशाली इस्लामिक स्कॉलर ने एक परिपत्र (Circular) जारी कर यह विवादित दावा किया है कि महिलाओं का सार्वजनिक स्थानों पर आना या पुरुषों के साथ मंच साझा करना समाज में ‘भयंकर विनाश’ (Great destruction) का कारण बनेगा।
यह विवादित और प्रतिगामी परिपत्र ‘समस्त केरल जमीय्यतुल उलमा’ (Samastha Kerala Jamiyyathul Ulama) के शीर्ष नेतृत्व द्वारा जारी किया गया है। संगठन के अध्यक्ष ई. सुलेमान मुसलियार (E. Sulaiman Musliar) और महासचिव कंथापुरम ए.पी. अबूबकर मुसलियार (Kanthapuram A.P. Aboobacker Musliar) ने अपने अनुयायियों और मुस्लिम समाज को यह सख्त निर्देश दिया है कि महिलाओं को किसी भी परिस्थिति में पुरुषों के साथ मंच (stages) साझा नहीं करना चाहिए और न ही उनके साथ सार्वजनिक स्थानों (public spaces) पर नज़र आना चाहिए।
रविवार को अपने एक विवादास्पद संबोधन में अबूबकर मुसलियार ने महिलाओं की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार करते हुए कहा कि “महिलाओं को अपने घरों तक ही सीमित रहना चाहिए” (women should remain confined to their homes)। 21वीं सदी में, जहां महिलाएं शिक्षा, विज्ञान, राजनीति और हर सार्वजनिक क्षेत्र में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं, वहां इस तरह के फतवे या परिपत्र को नागरिक अधिकारों का खुला उल्लंघन माना जा रहा है।
केरल जैसे राज्य में, जहां महिला साक्षरता दर और कार्यबल में उनकी भागीदारी देश में सबसे बेहतर मानी जाती है, वहां एक प्रभावशाली धार्मिक संस्था द्वारा ऐसे आदेश का जारी होना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। इस परिपत्र के सामने आते ही नागरिक समाज, महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और प्रगतिशील मुस्लिम विचारकों ने इसकी कड़ी निंदा की है। उनका तर्क है कि इस तरह के आदेश न केवल संविधान द्वारा दिए गए समानता और स्वतंत्रता के मूल अधिकारों के खिलाफ हैं, बल्कि ये समाज को पीछे की ओर धकेलने और महिलाओं को सामाजिक मुख्यधारा से बाहर करने की एक गहरी पितृसत्तात्मक साज़िश का हिस्सा हैं। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक, इस बात की मांग उठ रही है कि राज्य सरकार और मानवाधिकार आयोग को ऐसे प्रतिगामी बयानों का स्वतः संज्ञान लेना चाहिए। यह घटना इस बात को भी उजागर करती है कि आधुनिक शिक्षा के बावजूद, कुछ धार्मिक संस्थाएं अभी भी महिलाओं को एक स्वतंत्र नागरिक के बजाय केवल घरेलू परिधि में कैद रखने की मानसिकता से बाहर नहीं आ पाई हैं।