हरियाणा: सरकारी स्कूलों के निरीक्षण पर रोक का कंडेला खाप ने किया कड़ा विरोध, शिक्षा प्रणाली की कमियां छिपाने का लगाया आरोप

विवेक ओझा
चंडीगढ़ / जींद
हरियाणा के ग्रामीण समाज और वहां की सामाजिक संरचना में ‘खाप पंचायतों’ (Khap Panchayats) का प्रभाव अत्यंत गहरा और ऐतिहासिक रहा है। ये खाप पंचायतें न केवल सामाजिक रीति-रिवाजों को निर्देशित करती हैं, बल्कि स्थानीय प्रशासन और सरकारी नीतियों पर भी बेबाक राय रखती हैं। इसी कड़ी में, हरियाणा के शिक्षा विभाग द्वारा हाल ही में लिए गए एक विवादित फैसले ने राज्य के सबसे प्रभावशाली खापों में से एक को सरकार के खिलाफ खड़ा कर दिया है।
सर्व जातीय कंडेला खाप (Sarv Jatiya Kandela Khap) ने हरियाणा के सरकारी स्कूलों (Haryana government schools) में आम जनता और मीडिया द्वारा किए जाने वाले निरीक्षणों (inspections) पर लगाए गए प्रतिबंधों की कड़ी निंदा (condemns) की है। यह प्रतिबंध शिक्षा विभाग द्वारा तब लगाया गया था जब सोशल मीडिया और स्थानीय समाचार चैनलों पर कुछ वीडियो वायरल हुए थे, जिनमें सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतों, शिक्षकों की अनुपस्थिति और बुनियादी सुविधाओं की घोर कमी को उजागर किया गया था। इन खुलासों से असहज होकर, प्रशासन ने स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश और वीडियोग्राफी पर रोक लगा दी थी।
कंडेला खाप ने सरकार के इस कदम को सीधे तौर पर पारदर्शिता की हत्या और जवाबदेही से भागने का प्रयास बताया है। खाप के नेताओं ने एक बेहद गंभीर आरोप (alleged) लगाते हुए कहा है कि सरकार का यह कदम पूरी तरह से “शिक्षा प्रणाली की कमियों को छिपाने” (hiding shortcomings in the education system) के उद्देश्य से उठाया गया है। उनका तर्क है कि यदि स्कूलों में सब कुछ सही चल रहा है, तो फिर आम जनता या मीडिया के निरीक्षण से प्रशासन को इतना डर क्यों लग रहा है?
इस मुद्दे को लेकर खाप के शीर्ष नेताओं—ओम प्रकाश कंडेला (Om Prakash Kandela), जगत सिंह रेढू (Jagat Singh Redhu), और राज सिंह कंडेला (Raj Singh Kandela)—ने एक साझा बयान (joint statement) जारी किया है। इस बयान में उन्होंने एक बहुत ही महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और सामाजिक तथ्य की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया है। इन नेताओं ने इस बात पर विशेष ज़ोर (emphasised) दिया कि हरियाणा के गांवों में स्थापित अधिकांश सरकारी स्कूल अक्सर उन जमीनों (land) पर बनाए गए हैं, जिन्हें स्वयं ग्रामीणों ने दान (donated by villagers) में दिया था।
खाप नेताओं का यह तर्क है कि चूंकि ग्रामीणों ने अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए अपनी बेशकीमती ज़मीनें शिक्षा विभाग को मुफ्त में सौंपी थीं, इसलिए इन स्कूलों के कामकाज (functioning) में ग्रामीणों का एक “वैध अधिकार” या “वैध हिस्सेदारी” (legitimate stake) बनती है। ग्रामीण यह जानने का पूरा अधिकार रखते हैं कि उनके द्वारा दान की गई ज़मीन पर चल रहे स्कूल में उनके बच्चों को कैसी शिक्षा दी जा रही है, वहां पर्याप्त शिक्षक हैं या नहीं, और वहां पीने के पानी व शौचालयों की क्या व्यवस्था है। सरकार का यह प्रतिबंध एक प्रकार से ग्रामीणों को उनके ही गांव के संस्थानों से बेदखल करने जैसा है।
सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि कंडेला खाप का यह विरोध केवल एक प्रशासनिक आदेश के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण भारत में शिक्षा के गिरते स्तर के खिलाफ उठ रही एक बड़ी आवाज़ है। जब ग्रामीण समुदाय स्वयं शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता को लेकर जागरूक और मुखर होने लगता है, तो यह लोकतांत्रिक जवाबदेही का एक बेहतरीन उदाहरण बन जाता है। हरियाणा सरकार को अब इस प्रतिबंध पर पुनर्विचार करने के लिए भारी दबाव का सामना करना पड़ेगा। शिक्षाविदों का भी यही मानना है कि सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए मीडिया और समाज को दूर रखने के बजाय, उनके साथ मिलकर एक पारदर्शी और सहयोगात्मक मॉडल विकसित किया जाना चाहिए।