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नेपाल में जल प्रलय का तांडव: मौतों का आंकड़ा 939 तक पहुंचा, चीन ने तिब्बत में पनबिजली परियोजनाओं को आपदा का कारण बताने वाले दावों को बताया ‘दुर्भावनापूर्ण’

राघवेन्द्र प्रताप सिंह
काठमांडू / बीजिंग

हिमालयी राष्ट्र नेपाल इस समय अपने इतिहास की सबसे प्रलयकारी प्राकृतिक आपदाओं में से एक के परिणामों से जूझ रहा है। 26 अगस्त को अचानक आई विनाशकारी बाढ़ (Flash Flood) ने पूरे देश में तबाही के जो निशान छोड़े हैं, वे समय बीतने के साथ और भी खौफनाक होते जा रहे हैं। नेपाल के आपदा प्राधिकरण द्वारा जारी किए गए नवीनतम और हृदयविदारक आंकड़ों के अनुसार, इस बाढ़ आपदा में मरने वालों की संख्या बढ़कर 939 हो गई है। वहीं, राहत और बचाव कार्यों के आगे बढ़ने के साथ लापता लोगों की संख्या घटकर 3,925 रह गई है। यह मानवीय त्रासदी केवल नेपाल तक सीमित नहीं रही है, बल्कि इसने एक बड़े क्षेत्रीय और कूटनीतिक विवाद को भी जन्म दे दिया है।

इस जल प्रलय के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर कई पर्यावरणविदों और भूवैज्ञानिकों ने आपदा के मूल कारणों को लेकर गंभीर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। कई रिपोर्टों में यह अंदेशा जताया गया था कि सीमा पार तिब्बत में हो रहे अनियंत्रित और विशाल निर्माण कार्यों ने हिमालय के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को अस्थिर कर दिया है। इस भू-राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच, चीन ने नेपाल में 26 अगस्त को आई अचानक बाढ़ आपदा को तिब्बत में उसकी विशाल पनबिजली परियोजनाओं से जोड़ने वाले दावों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। चीन ने बेहद सख्त कूटनीतिक भाषा का इस्तेमाल करते हुए इन सभी आरोपों को सिरे से नकार दिया है।

चीनी अधिकारियों और प्रशासन ने हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाने के आरोपों का बचाव करते हुए इन रिपोर्टों को “दुर्भावनापूर्ण अटकलें” (malicious speculation) करार दिया है। चीन का तर्क है कि उसकी सभी जलविद्युत परियोजनाएं पूरी तरह से वैज्ञानिक अध्ययन और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाई गई हैं, और नेपाल में आई बाढ़ विशुद्ध रूप से चरम मौसमी घटनाओं (Extreme weather events) और जलवायु परिवर्तन का परिणाम है। हालांकि, स्वतंत्र शोधकर्ताओं का मानना है कि हिमालयी क्षेत्र में नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को रोकने वाले विशाल बांध और टनलिंग कार्य ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) के खतरे को कई गुना बढ़ा देते हैं।

इस कूटनीतिक घमासान से इतर, नेपाल की ज़मीनी हकीकत बेहद दर्दनाक है। नुवाकोट जिले के देवीघाट (Devighat) जैसे कई बुरी तरह प्रभावित इलाकों में स्थानीय निवासी अभी भी अपने क्षतिग्रस्त घरों के मलबे से अपनी बची-खुची ज़िंदगी समेटने की कोशिश कर रहे हैं। संचार तंत्र, सड़कें और पुल पूरी तरह से तबाह हो चुके हैं, जिससे दूरस्थ पहाड़ी गांवों में सेना और आपदा प्रबंधन दलों को पहुंचने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। जो 3,925 लोग अभी भी लापता हैं, उनके जीवित बचने की उम्मीदें हर गुज़रते दिन के साथ क्षीण होती जा रही हैं।

नेपाल सरकार ने इस अभूतपूर्व संकट से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद की गुहार लगाई है। भारत सहित कई देशों ने त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए राहत सामग्री और विशेष बचाव दल भेजे हैं। यह आपदा इस बात की एक बहुत बड़ी चेतावनी है कि हिमालयी क्षेत्र विकास की अंधी दौड़ और बुनियादी ढांचे के अति-विस्तार का भार अब और नहीं सह सकता। चाहे वह जलवायु परिवर्तन का प्रकोप हो या विशाल पनबिजली परियोजनाओं का दुष्प्रभाव, इस विनाश ने साबित कर दिया है कि प्रकृति के साथ किया गया कोई भी खिलवाड़ अंततः हज़ारों निर्दोष जिंदगियों को ही अपनी कीमत चुकाने पर मजबूर करता है।