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हल्द्वानी ‘शुद्धिकरण’ विवाद: कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज, उत्तराखंड की राजनीति में घमासान तेज़

अभिषेक सिंह
हल्द्वानी / नई दिल्ली

उत्तराखंड की राजनीति में ध्रुवीकरण और प्रतीकात्मक विवादों का एक नया अध्याय उस समय खुल गया, जब एक राजनीतिक कार्यक्रम स्थल के तथाकथित ‘शुद्धिकरण’ को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। इस गरमाते राजनीतिक माहौल के बीच, लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ उनके द्वारा की गई ‘शुद्धिकरण’ संबंधी टिप्पणियों को लेकर एक प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई है। यह मामला केवल एक राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने राज्य में सामाजिक न्याय, छुआछूत और राजनीतिक प्रतिशोध जैसे गहरे मुद्दों को फिर से सतह पर ला दिया है।

इस पूरे राजनीतिक विवाद की जड़ें अगस्त महीने की शुरुआत में हुए घटनाक्रमों से जुड़ी हैं। दरअसल, यह राजनीतिक विवाद (political row) तब भड़का जब कुछ व्यक्तियों ने कथित तौर पर 11 अगस्त को हल्द्वानी के रामलीला मैदान में एक ‘शुद्धिकरण यज्ञ’ (purification yajna) का आयोजन किया। यह घटनाक्रम राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील था क्योंकि यह ‘शुद्धिकरण’ ठीक उस स्थान पर किया गया था, जहां इससे कुछ ही दिन पहले कांग्रेस के एक शीर्ष नेता ने जनसभा की थी। यह विवादित कृत्य 8 अगस्त को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा उसी रामलीला मैदान में आयोजित एक विशाल जनसभा के ठीक बाद किया गया था।

मल्लिकार्जुन खरगे, जो कि भारतीय राजनीति में एक कद्दावर दलित नेता के रूप में जाने जाते हैं, की जनसभा के बाद मैदान को गंगाजल या यज्ञ के माध्यम से ‘पवित्र’ करने की इस कथित घटना ने कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी को भारी आक्रोश से भर दिया था। कांग्रेस ने इसे सीधे तौर पर दलित समुदाय का अपमान और सदियों पुरानी छुआछूत की मानसिकता का भोंडा प्रदर्शन करार दिया था। इसी संदर्भ में राहुल गांधी ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी, जिसके बाद उनके खिलाफ यह एफआईआर दर्ज की गई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘शुद्धिकरण’ जैसी घटनाएं केवल राजनीतिक द्वेष का परिणाम नहीं होतीं, बल्कि ये उस गहरी सामाजिक खाई को भी दर्शाती हैं जो आज भी समाज के कुछ वर्गों में मौजूद है। जब किसी राष्ट्रीय स्तर के दलित नेता के कार्यक्रम स्थल को ‘अशुद्ध’ मानकर उसका ‘शुद्धिकरण’ किया जाता है, तो यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों—समानता और बंधुत्व—पर एक सीधा प्रहार होता है। राहुल गांधी द्वारा इस मुद्दे को राष्ट्रीय पटल पर उठाने और इसके खिलाफ आक्रामक बयान देने से उत्तराखंड की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार और कांग्रेस के बीच कड़वाहट अपने चरम पर पहुंच गई है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी राजनेता के खिलाफ एफआईआर दर्ज होना पुलिस प्रशासन की एक सामान्य प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन जब मामला राजनीतिक रूप से इतना संवेदनशील हो, तो इसके दूरगामी परिणाम होते हैं। यह एफआईआर राहुल गांधी के उन बयानों पर आधारित बताई जा रही है, जिनमें उन्होंने इस ‘शुद्धिकरण’ कृत्य की तुलना मनुवादी और जातिवादी मानसिकता से की थी। कांग्रेस पार्टी ने इस एफआईआर को राज्य सरकार की ‘बदले की कार्रवाई’ और ‘दलित विरोधी मानसिकता को संरक्षण देने वाला कदम’ बताया है। पार्टी के स्थानीय नेताओं का कहना है कि पुलिस ने उन लोगों के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं की जिन्होंने रामलीला मैदान में यह असंवैधानिक और अपमानजनक यज्ञ किया था, बल्कि आवाज़ उठाने वाले विपक्ष के नेता को ही कानूनी पचड़े में फंसाने की कोशिश की जा रही है।

आगामी चुनावों और राज्य के सामाजिक समीकरणों को देखते हुए, हल्द्वानी का यह रामलीला मैदान अब एक वैचारिक युद्धक्षेत्र में तब्दील हो चुका है। जहां एक ओर कांग्रेस इसे दलित अस्मिता और सामाजिक न्याय का मुद्दा बनाकर सड़कों पर उतरने की तैयारी कर रही है, वहीं दूसरी ओर सत्ता पक्ष इस विवाद को शांत करने और राहुल गांधी के बयानों को समाज में वैमनस्य फैलाने का प्रयास बताकर अपना बचाव कर रहा है। यह घटनाक्रम स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि 21वीं सदी के भारत में भी राजनीतिक विरोधियों को नीचा दिखाने के लिए जाति और धर्म से जुड़े प्रतीकों का इस्तेमाल कितनी आक्रामकता के साथ किया जा रहा है।