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नेपाल जल प्रलय का भयावह मंज़र: 788 तक पहुंचा मौत का आंकड़ा, अपनों की तलाश में भटकते परिवारों के बीच शुरू हुआ सामूहिक अंतिम संस्कार

अभिषेक सिंह
काठमांडू / नई दिल्ली

पड़ोसी देश नेपाल इस समय प्रकृति के सबसे क्रूर और विनाशकारी तांडव का गवाह बन रहा है। हाल ही में आई अचानक बाढ़ (Flash Floods) और भयानक भूस्खलन ने पूरे देश के बुनियादी ढांचे और मानवीय जीवन को झकझोर कर रख दिया है। आपदा के ताज़ा अपडेट्स के अनुसार, इस जल प्रलय में अपनी जान गंवाने वालों का आधिकारिक आंकड़ा 788 के खौफनाक स्तर तक पहुंच गया है। मौतों का यह आंकड़ा नेपाल के हालिया इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक की कहानी बयां कर रहा है। लेकिन इस त्रासदी का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि आपदा के कई दिन बीत जाने के बाद भी लगभग 2,502 लोग अभी भी लापता हैं। राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) द्वारा जारी किए गए इन आंकड़ों ने पूरे देश में मातम और निराशा का माहौल पैदा कर दिया है।

लगातार बढ़ते शवों के आंकड़े और लापता लोगों की भारी संख्या ने नेपाल सरकार और प्रशासन के सामने एक अभूतपूर्व मानवीय और तार्किक संकट खड़ा कर दिया है। मुर्दाघरों में जगह की कमी और संक्रमण फैलने के भारी खतरे को देखते हुए, नेपाल सरकार ने एक बेहद कड़ा और हृदयविदारक फैसला लिया है। प्रशासन ने अब अज्ञात बाढ़ पीड़ितों का ‘सामूहिक अंतिम संस्कार’ (Mass Burials) शुरू कर दिया है। 30 अगस्त 2026 को चितवन (Chitwan) के देवघाट सामूहिक दफन स्थल (Devghat mass burial site) पर सशस्त्र पुलिस बल (Armed Police Force) के जवानों को पीपीई किट पहने हुए दर्जनों अज्ञात शवों को एक बड़े गड्ढे की ओर ले जाते हुए देखा गया। यह दृश्य उन परिवारों के लिए किसी দুঃस्वप्न से कम नहीं है, जो अभी भी अस्पतालों और पुलिस स्टेशनों के बाहर अपने लापता प्रियजनों की एक झलक पाने या कम से कम उनके अंतिम दर्शन करने की आस में भटक रहे हैं।

इस मानवीय त्रासदी के बीच, बचाव दल अपनी जान जोखिम में डालकर एक और मोर्चे पर जंग लड़ रहे हैं। भूस्खलन और बाढ़ के मलबे के कारण एक निर्माणाधीन सुरंग के ढह जाने से कई टनल वर्कर (Tunnel workers) अंदर ही फंस गए हैं। कीचड़, विशाल चट्टानों और लगातार गिर रहे मलबे के बीच बचाव दल भारी ड्रिलिंग मशीनों के सहारे इन फंसे हुए मज़दूरों तक पहुंचने की जद्दोजहद कर रहे हैं। सुरंग के भीतर ऑक्सीजन की कमी और जलभराव के कारण हर बीतता मिनट इन मज़दूरों की ज़िंदगी के लिए भारी पड़ रहा है।

प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि बाढ़ का पानी और कीचड़ का बहाव इतना तेज़ था कि कई बस्तियां पूरी तरह से नक्शे से ही मिट गई हैं। संचार लाइनें और मुख्य संपर्क मार्ग टूट जाने के कारण दूरदराज के पहाड़ी इलाकों से मौतों और नुकसान का पूरा आंकड़ा अभी तक सामने नहीं आ पाया है। सामूहिक अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू होने से उन परिवारों का दर्द और भी गहरा हो गया है जो यह नहीं जानते कि उनके अपने जीवित भी हैं या उन अज्ञात शवों में शामिल हैं जिन्हें एक साथ दफनाया जा रहा है। नेपाल की यह त्रासदी केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक गहरे मानवीय संकट में तब्दील हो चुकी है, जिससे उबरने में इस हिमालयी देश को कई वर्ष लग जाएंगे।