यूपी नौकरशाही में भूचाल: आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल के इस्तीफे पर यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने उठाया सवाल, राज्यपाल के हस्तक्षेप की मांग की

विवेक ओझा
लखनऊ
उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने राज्य की नौकरशाही की कार्यप्रणाली और राजनीतिक माहौल पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य के विकास में अहम भूमिका निभाने वाली एक तेज़-तर्रार प्रशासनिक अधिकारी के अचानक इस्तीफे ने विपक्षी दलों को सरकार पर हमलावर होने का एक बड़ा मौका दे दिया है। ताज़ा मामले में, यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय ने 2013 बैच की आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल के इस्तीफे का मुद्दा ज़ोर-शोर से उठाया है। उन्होंने इस मामले को अत्यंत संवेदनशील बताते हुए सीधे राजभवन का दरवाज़ा खटखटाने की बात कही है।
इस प्रशासनिक संकट को एक बड़े राजनीतिक मुद्दे में तब्दील करते हुए, उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी (UPCC) के अध्यक्ष अजय राय ने इस पूरे प्रकरण में प्रदेश की राज्यपाल के हस्तक्षेप की मांग की है। एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी द्वारा अपने 13 साल के प्रतिष्ठित करियर को बीच में ही छोड़ देना किसी भी राज्य के सुशासन मॉडल पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
अजय राय ने इस इस्तीफे को लेकर सरकार की मंशा और नौकरशाही के भीतर के दबावों को कटघरे में खड़ा किया है। आईएएस अधिकारी के इस इस्तीफे को ‘बहुत गंभीर’ (very serious) बताते हुए, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने मांग की है कि राज्य सरकार को इस मामले की गंभीरता से जांच करनी चाहिए और पूरी सच्चाई को जनता के सामने लाना चाहिए। उनका यह बयान इस बात की ओर भी इशारा करता है कि राज्य में अधिकारियों को स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से काम करने का माहौल नहीं मिल रहा है, जिसके कारण उन्हें हताश होकर सेवा से बाहर जाने का कठोर कदम उठाना पड़ रहा है।
दिव्या मित्तल, जो कि 2013-बैच की भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) की अधिकारी हैं, अपनी कार्यकुशलता और ज़मीनी स्तर पर जनता से जुड़ाव के लिए जानी जाती रही हैं। उनके अचानक इस्तीफे ने नौकरशाही हलकों में कई तरह की अफवाहों और चर्चाओं को जन्म दे दिया है। विपक्ष का आरोप है कि राज्य सरकार की कार्यप्रणाली में अत्यधिक राजनीतिकरण और ‘पिक-एंड-चूज़’ (pick-and-choose) की नीति हावी हो गई है, जिसके चलते ईमानदार और ज़मीनी अधिकारियों का मनोबल टूट रहा है।
कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे को महज़ एक अधिकारी के इस्तीफे के रूप में नहीं, बल्कि सुशासन और प्रशासनिक पारदर्शिता के एक व्यापक मुद्दे के रूप में देख रही है। राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग करके विपक्ष ने एक कड़ा संदेश दिया है कि सत्ता के गलियारों में चलने वाली मनमानी पर लगाम लगनी चाहिए। यदि एक अनुभवी और प्रशिक्षित अधिकारी अपनी स्वेच्छा से, अपने 13 साल के कार्यकाल को ‘अविस्मरणीय’ बताकर सेवा से अलग हो जाता है, तो इसके पीछे के वास्तविक कारणों (The Truth) की निष्पक्ष जांच होनी ही चाहिए। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य सरकार इस राजनीतिक दबाव का क्या जवाब देती है और क्या राज्यपाल इस मामले में कोई रिपोर्ट तलब करते हैं या नहीं।