अमेरिकी प्रतिबंधों की धमकियों के बीच ईरान का पलटवार: ‘आर्थिक दम घोंटने’ की नीतियों से कुछ हासिल नहीं होगा- ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन

सरिता त्रिपाठी
तेहरान / वाशिंगटन
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच की तल्खी अब एक नए और बेहद खतरनाक मुकाम पर पहुंच गई है। अमेरिका द्वारा ईरान को आर्थिक रूप से पूरी तरह से अलग-थलग करने की नई घोषणाओं के बाद ईरान ने भी कड़ा पलटवार किया है। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने अमेरिकी चेतावनियों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट रूप से कहा है कि नए अमेरिकी प्रतिबंधों (U.S. sanctions) से कुछ भी हासिल नहीं होगा। यह बयान इस बात का साफ संकेत है कि ईरान अमेरिकी दबाव के आगे घुटने टेकने के मूड में बिल्कुल नहीं है।
इस ताज़ा भू-राजनीतिक टकराव की शुरुआत अमेरिका द्वारा घोषित एक बेहद आक्रामक आर्थिक रणनीति से हुई है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट (Scott Bessent) ने ईरान के खिलाफ एक सख्त योजना पेश की है, जिसे उन्होंने स्पष्ट रूप से ईरान का “आर्थिक दम घोंटना” (economic asphyxiation) करार दिया है। यह रणनीति केवल ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने पूरी दुनिया के व्यापारिक समीकरणों को उलझा कर रख दिया है।
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव ने अपनी इस दंडात्मक रणनीति के तहत दुनिया भर के उन देशों को बेहद गंभीर परिणामों (dire consequences) की चेतावनी भी दी है, जो अमेरिका के इस प्रतिबंध अभियान (campaign) में शामिल नहीं होंगे। इसका सीधा अर्थ यह है कि अमेरिका अब ‘सेकेंडरी सैंक्शंस’ (Secondary Sanctions) का दायरा बढ़ाकर उन सभी विदेशी बैंकों, कंपनियों और संप्रभु राष्ट्रों को दंडित करने की तैयारी कर रहा है जो ईरान के साथ ऊर्जा या व्यापारिक संबंध बनाए रखेंगे। यह आक्रामकता वैश्विक तेल बाज़ार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए एक बहुत बड़ा झटका साबित हो सकती है।
हालांकि, 26 अगस्त 2026 को सामने आए इस घटनाक्रम के बाद, ईरानी नेतृत्व ने कोई भी रक्षात्मक रुख नहीं अपनाया है। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन का बयान यह दर्शाता है कि ईरान पिछले कई दशकों से इस तरह के आर्थिक युद्ध का सामना कर रहा है और उसने प्रतिबंधों के बीच एक समानांतर ‘प्रतिरोध अर्थव्यवस्था’ (Resistance Economy) विकसित कर ली है। ईरान का मानना है कि अमेरिका की यह एकतरफा नीति (Unilateralism) अंततः स्वयं पश्चिमी देशों के हितों को नुकसान पहुंचाएगी, क्योंकि दुनिया भर के देश अमेरिकी डॉलर के एकाधिकार (Hegemony) से आज़ाद होने के लिए वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों की ओर रुख कर रहे हैं।
यह गतिरोध मध्य पूर्व (Middle East) में शांति और स्थिरता के लिए भी एक बहुत बड़ा खतरा है। जब किसी देश को ‘आर्थिक रूप से दम घोंटने’ की स्थिति में धकेल दिया जाता है, तो इसके सैन्य और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े परिणाम भी बेहद आक्रामक हो सकते हैं। अमेरिका की इस ‘अधिकतम दबाव’ (Maximum Pressure) की नीति ने ईरान के साथ किसी भी कूटनीतिक वार्ता या परमाणु समझौते की बची-खुची गुंजाइश को भी लगभग खत्म कर दिया है। अब यह देखना होगा कि भारत, चीन और रूस जैसे प्रमुख देश अमेरिकी ट्रेजरी के इस सीधे फरमान पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं, क्योंकि यह उनके संप्रभु व्यापारिक अधिकारों पर भी एक बड़ा प्रहार है।