दिल्ली प्रदर्शन में पैलेट गन का इस्तेमाल: 10 लोगों के घायल होने के खुलासे के बीच CRPF ने RTI के तहत जानकारी देने से किया इनकार

द इंडियन व्यू टीम
नई दिल्ली
लोकतांत्रिक देशों में भीड़ नियंत्रण और प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए सुरक्षा बलों द्वारा अपनाए जाने वाले तौर-तरीके हमेशा से मानवाधिकारों और प्रशासनिक जवाबदेही की कसौटी पर परखे जाते रहे हैं। हाल ही में दिल्ली में हुए एक उग्र विरोध प्रदर्शन के दौरान ‘पैलेट गन’ (Pellet gun) के कथित इस्तेमाल ने राजधानी के प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में एक बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है। इस गंभीर मुद्दे पर जब सूचना के अधिकार (RTI) के तहत जवाबदेही मांगी गई, तो केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) के रवैये ने एक नए विवाद को जन्म दे दिया है।
दिल्ली विरोध प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर दायर की गई एक आरटीआई के जवाब में, सीआरपीएफ (CRPF) ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वह इस मामले में कोई भी जानकारी उजागर करने के लिए उत्तरदायी (liable to disclose any information) नहीं है। सुरक्षा बलों को आरटीआई अधिनियम की धारा 24 के तहत सामान्य खुलासों से छूट प्राप्त है, लेकिन मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में यह छूट लागू नहीं होती।
यहीं पर सबसे बड़ा वैचारिक और कानूनी टकराव उत्पन्न हुआ है। अपने जवाब में, सीआरपीएफ ने दलील दी है कि “आवेदन में लगाए गए आरोप मानवाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित अपवाद (exception relating to violation of human rights) को आकर्षित नहीं करते हैं।”। इसका सीधा अर्थ यह है कि बल यह मानने को तैयार नहीं है कि निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन का इस्तेमाल किसी भी प्रकार का मानवाधिकार हनन है, जिसके लिए उन्हें जानकारी सार्वजनिक करनी पड़े।
हालांकि, आरटीआई कार्यकर्ता और नेता साकेत गोखले (Saket Gokhale) द्वारा जुटाए गए मेडिकल साक्ष्यों ने सीआरपीएफ के इस बचाव पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। साकेत गोखले ने बताया कि आरटीआई आवेदनों के जवाब में लेडी हार्डिंग अस्पताल (Lady Hardinge Hospital) और सफदरजंग अस्पताल (Safdarjung Hospital) से प्राप्त रिकॉर्ड एक बिल्कुल अलग और खौफनाक कहानी बयां करते हैं। इन रिकॉर्ड्स से पता चला है कि 20 जुलाई को हुए प्रदर्शन के दौरान लेडी हार्डिंग में नौ (nine) और सफदरजंग में एक (one) व्यक्ति—यानी कुल दस लोग—पैलेट गन की चोटों (pellet gun injuries) के साथ भर्ती हुए थे।
राजधानी दिल्ली जैसे महानगर में, जहां प्रदर्शन एक लोकतांत्रिक अधिकार माना जाता है, वहां भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस या पानी की बौछार के बजाय पैलेट गन जैसे घातक हथियारों का इस्तेमाल करना बेहद चिंताजनक है। कश्मीर घाटी में पैलेट गन के इस्तेमाल के कारण आंखों की रोशनी जाने और गंभीर रूप से घायल होने की भयानक तस्वीरें पूरी दुनिया देख चुकी है। अस्पतालों के मेडिकल रिकॉर्ड स्पष्ट रूप से यह साबित करते हैं कि पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ है और इससे लोग घायल हुए हैं।
ऐसे में सीआरपीएफ का यह कहना कि इसमें कोई मानवाधिकार उल्लंघन का मामला नहीं बनता, पारदर्शिता और जवाबदेही के लोकतांत्रिक सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत है। नागरिक अधिकार संगठनों और विपक्षी नेताओं ने इस मुद्दे पर सरकार से स्पष्टीकरण की मांग की है। उनका तर्क है कि यदि सुरक्षा बलों ने किसी मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का उल्लंघन करते हुए घातक बल का प्रयोग किया है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और आरटीआई के तहत सच को छिपाने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए। यह विवाद ‘राज्य की शक्ति’ बनाम ‘नागरिकों के अधिकार’ की एक लंबी कानूनी लड़ाई का रूप लेता नज़र आ रहा है।