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अरविंद केजरीवाल पर लगे 25,000 जुर्माने को रद्द करने की मांग :

नई दिल्ली ( अभिषेक सिंह ) : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक डिग्री से जुड़े विवाद में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर लगाए गए 25,000 के जुर्माने को रद्द करने की मांग तेज हो गई है. गुजरात हाई कोर्ट के सिंगल जज द्वारा दिए गए इस आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान, केजरीवाल की ओर से सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत के सामने कई बेहद अहम दलीलें पेश कीं।

अदालत में पक्ष रखते हुए सीनियर एडवोकेट डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि सिंगल जज के फैसले में केजरीवाल के खिलाफ की गई तीखी टिप्पणियों और 25,000 के जुर्माने, दोनों को ही तुरंत रद्द किया जाना चाहिए. सिंघवी के मुताबिक, कोर्ट द्वारा की गई ये टिप्पणियां न सिर्फ अनुचित और अनावश्यक हैं, बल्कि कानूनी रूप से भी पूरी तरह गलत हैं।

दरअसल, सिंगल जज ने अपने फैसले में कहा था कि विवादित डिग्री पहले से ही यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर उपलब्ध थी और स्थिति पूरी तरह साफ होने के बावजूद अरविंद केजरीवाल ने इस मुकदमे को जानबूझकर जारी रखा. अरविंद केजरीवाल के वकील ने कोर्ट की इन दोनों ही बातों का पुरजोर विरोध किया है।

सिंघवी ने हाई कोर्ट को स्पष्ट बताया कि असलियत यह है कि आज की तारीख में भी संबंधित डिग्री यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है. इसके अलावा, एक बड़ा तकनीकी पहलू यह भी है कि केजरीवाल इस याचिका में मुख्य आवेदक थे ही नहीं, बल्कि वे इस मामले में महज एक प्रतिवादी थे. ऐसे में यह तर्क देना कानूनी रूप से बिल्कुल गलत है कि केजरीवाल ने खुद इस केस को आगे बढ़ाया.

सिंघवी ने अदालत को बताया कि जिस आरटीआई (RTI) के आधार पर इस मामले की कार्यवाही शुरू हुई, वह भी अरविंद केजरीवाल ने दायर नहीं की थी. इसके बावजूद, सिंगल जज ने उन पर 25,000 का भारी जुर्माना थोप दिया. सिंघवी ने पुरजोर शब्दों में कहा कि न केवल इस जुर्माने को हटाया जाना चाहिए, बल्कि जुर्माना लगाते समय सिंगल जज ने जो टिप्पणियां की थीं, उन्हें भी रिकॉर्ड से हटाया जाए, क्योंकि इस पूरी कार्रवाई का कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है।

अदालत के सामने यह साफ किया गया कि केजरीवाल इस पूरे मामले में मूल आवेदक थे ही नहीं. केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने एक पत्र का संज्ञान लेते हुए खुद इस कार्यवाही को आगे बढ़ाया था, जबकि केजरीवाल ने खुद आरटीआई के तहत प्रधानमंत्री की डिग्री को लेकर कोई प्रत्यक्ष जानकारी नहीं मांगी थी. वे तो इस पूरे मामले में केवल एक प्रतिवादी के तौर पर शामिल हुए थे।

इसी बात को रेखांकित करते हुए सिंघवी ने मजबूत तर्क दिया कि जब अरविंद केजरीवाल इस मामले में मुख्य याचिकाकर्ता ही नहीं थे, तो उनके द्वारा केस को जबरन खींचने या आगे बढ़ाने का सवाल ही पैदा नहीं होता. ऐसे हालात में, उन पर 25,000 का जुर्माना लगाना पूरी तरह से अनुचित, अतार्किक और अनावश्यक है।