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यूपी और राजस्थान के स्कूलों में पत्रकारों-कार्यकर्ताओं के प्रवेश पर रोक: सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से किया इनकार, पारदर्शिता पर उठे सवाल

अभिषेक सिंह
नई दिल्ली

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों की जर्जर अवस्था और वहां शिक्षा की गुणवत्ता हमेशा से एक राष्ट्रीय चिंता का विषय रही है। इन कमियों को उजागर करने के लिए नागरिक समाज और पत्रकार अक्सर जमीनी स्तर पर जाकर रिपोर्टिंग करते हैं। हालांकि, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की राज्य सरकारों द्वारा पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सरकारी स्कूलों में प्रवेश पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों ने एक बड़ा कानूनी और सामाजिक विवाद खड़ा कर दिया है। इस विवाद पर न्याय की आस लगाए याचिकाकर्ताओं को सर्वोच्च न्यायालय से भी कोई राहत नहीं मिली है।

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने यूपी और राजस्थान के स्कूलों में पत्रकारों और कार्यकर्ताओं के प्रवेश पर लगी रोक को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत का यह रुख राज्य सरकारों के प्रशासनिक नियंत्रण के अधिकार को तो सुरक्षित रखता है, लेकिन साथ ही यह सार्वजनिक संस्थानों की पारदर्शिता को लेकर भी एक गहरी बहस छोड़ जाता है।

यह कानूनी लड़ाई अचानक शुरू नहीं हुई थी, बल्कि इसके पीछे एक व्यापक जन-अभियान था। यह याचिका ग्रामीण भारत में सरकारी स्कूलों के उपेक्षित बुनियादी ढांचे का ऑडिट करने और सुधारने के लिए सीजेपी (CJP) द्वारा ‘स्कूल ठीक करो’ (School Thik Karo) अभियान की घोषणा के तुरंत बाद दायर की गई थी। सीजेपी और अन्य नागरिक संगठनों का उद्देश्य स्कूलों में पेयजल की कमी, टूटी छतों, बिना शौचालय वाले परिसरों और शिक्षकों की अनुपस्थिति जैसी ज़मीनी हकीकत को कैमरे में कैद कर सरकार के सामने लाना था।

राज्य सरकारों द्वारा जारी किए गए इन आदेशों से इस तरह के किसी भी ऑडिट पर पूरी तरह से रोक लग गई है। याचिका में साफ तौर पर कहा गया था कि इन आदेशों ने कक्षाओं के दस्तावेज़ीकरण (documentation of classrooms) को रोक दिया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जब तक स्कूलों की कमियों की तस्वीरें और वीडियो सबूत के तौर पर सार्वजनिक डोमेन में नहीं आएंगे, तब तक शिक्षा विभाग की जवाबदेही तय नहीं की जा सकेगी।

दूसरी ओर, राज्य सरकारों का बचाव यह है कि स्कूलों में बाहरी लोगों का प्रवेश छात्रों की निजता, उनकी सुरक्षा और शैक्षणिक माहौल के लिए हानिकारक हो सकता है। वे तर्क देते हैं कि ऑडिट का काम शिक्षा विभाग के अधिकारियों का है, न कि निजी कार्यकर्ताओं या पत्रकारों का। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस याचिका को खारिज किए जाने के बाद, अब यह देखना होगा कि नागरिक संगठन ग्रामीण शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए ‘स्कूल ठीक करो’ जैसे अभियानों को आगे कैसे बढ़ाते हैं। इस फैसले ने सूचना के अधिकार (RTI) और सरकारी कामकाज में सार्वजनिक भागीदारी के बीच के जटिल संतुलन को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।