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बसपा की महत्वपूर्ण बैठक में नहीं दिखे आकाश आनंद, राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती का संदेश- अभी परिपक्व होने की जरूरत

राघवेन्द्र प्रताप सिंह
लखनऊ

उत्तर प्रदेश की राजनीति और विशेषकर दलित विमर्श की सबसे बड़ी धुरी मानी जाने वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के भीतर नेतृत्व, भविष्य की रणनीति और पीढ़ीगत बदलाव को लेकर एक बड़ी उथल-पुथल का दौर जारी है। हाल ही में लखनऊ में बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा बुलाई गई पार्टी के शीर्ष नेताओं और पदाधिकारियों की एक बेहद महत्वपूर्ण बैठक में एक ऐसा नज़ारा देखने को मिला, जिसने राजनीतिक हलकों में कई नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। इस बैठक में मायावती के भतीजे और पार्टी के पूर्व नेशनल कोऑर्डिनेटर आकाश आनंद की गैर-मौजूदगी सबसे अधिक सुर्खियों में रही। यह घटनाक्रम स्पष्ट रूप से पार्टी के भीतर चल रहे अनुशासन और नेतृत्व के कड़े मानकों को दर्शाता है।

आकाश आनंद, जिन्हें कुछ समय पहले तक बहुजन समाज पार्टी का निर्विवाद राजनीतिक उत्तराधिकारी और युवा चेहरा माना जा रहा था, का पार्टी की इस अहम रणनीतिक बैठक से नदारद रहना केवल एक संयोग नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती का एक बहुत ही स्पष्ट और सख्त संदेश छिपा है। मायावती ने अपने इस कदम से पार्टी कैडर और अपने भतीजे, दोनों को यह जता दिया है कि राजनीति में केवल रिश्तेदारी ही पद की गारंटी नहीं हो सकती, बल्कि राजनीतिक ‘परिपक्वता’ (Maturity) और ज़मीनी समझ सबसे अधिक मायने रखती है।

इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें कुछ महीने पीछे जाना होगा। आकाश आनंद को बहुजन समाज पार्टी के पुनरुद्धार और युवा मतदाताओं को पार्टी से जोड़ने की एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। उन्हें नेशनल कोऑर्डिनेटर का पद दिया गया था और उन्हें मायावती के बाद पार्टी के दूसरे नंबर के नेता के रूप में पेश किया जा रहा था। अपनी रैलियों में आकाश आनंद ने काफी आक्रामक और तीखी बयानबाज़ी शुरू कर दी थी। चुनावी रैलियों के दौरान उनके द्वारा इस्तेमाल की गई कुछ शब्दावली और आक्रामक रुख के कारण न केवल उनके खिलाफ आचार संहिता के उल्लंघन की एफआईआर दर्ज हुई, बल्कि पार्टी के अनुशासित राजनीतिक नैरेटिव को भी नुकसान पहुंचा।

बसपा अध्यक्ष मायावती, जो हमेशा से अपने सधे हुए बयानों, कैडर-आधारित राजनीति और सख्त अनुशासन के लिए जानी जाती हैं, को आकाश आनंद का यह अति-आक्रामक और अपरिपक्व रवैया रास नहीं आया। नतीजतन, उन्होंने एक कड़ा फैसला लेते हुए चुनाव के बीच में ही आकाश आनंद को उनके सभी प्रमुख पदों से हटा दिया था। मायावती ने तब यह सार्वजनिक रूप से कहा था कि आकाश को अभी राजनीतिक रूप से ‘परिपक्व’ होने की सख्त जरूरत है।

अब, जब पार्टी अपने सबसे खराब चुनावी दौर से गुज़र रही है और अपना मुख्य दलित वोट बैंक वापस हासिल करने के लिए संघर्ष कर रही है, तब इस बैठक में आकाश आनंद की अनुपस्थिति यह साबित करती है कि मायावती का वह स्टैंड अभी भी बरकरार है। मायावती का यह संदेश बहुत साफ है कि जब तक आकाश ज़मीनी हकीकत, कैडर की नब्ज़ और संयमित राजनीति का गहरा अनुभव हासिल नहीं कर लेते, तब तक उन्हें पार्टी के केंद्रीय निर्णयों से दूर रखा जाएगा।

बसपा वर्तमान में चंद्रशेखर आज़ाद की आज़ाद समाज पार्टी जैसे नए और आक्रामक दलित राजनीतिक विकल्पों की चुनौती का सामना कर रही है। ऐसे समय में पार्टी को एक युवा और ऊर्जावान चेहरे की नितांत आवश्यकता है जो युवाओं को आकर्षित कर सके। लेकिन मायावती यह जोखिम नहीं उठाना चाहतीं कि अपरिपक्व बयानों के कारण पार्टी का वह ‘साइलेंट वोटर’ भी छिटक जाए, जो बसपा को एक गंभीर और अनुशासित पार्टी मानता है। आकाश आनंद के लिए यह दौर आत्म-मंथन और राजनीतिक ज़मीन तैयार करने का एक कड़ा परीक्षण है, जिसे पास किए बिना उनकी बसपा में वापसी आसान नहीं होगी।