75 साल की आजादी का सबसे कड़वा सच! ‘हम चांद पर पहुंच गए, लेकिन…’: हाथ से मैला ढोने की अमानवीय प्रथा पर बॉम्बे हाई कोर्ट का अब तक का सबसे तीखा प्रहार

अभिषेक सिंह
मुंबई/महाराष्ट्र: भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान में झंडे गाड़ते हुए चांद पर अपना तिरंगा फहरा दिया है, लेकिन जमीन पर एक ऐसा काला सच आज भी जिंदा है जो हमारे सिस्टम के माथे पर कलंक है। बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) ने ‘मैनुअल स्कैवेंजिंग’ (हाथ से मैला ढोने और सीवर में उतरने की प्रथा) के लगातार जारी रहने पर महाराष्ट्र सरकार और प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि आजादी के सात दशक से ज्यादा बीत जाने के बाद भी हम इस अमानवीय प्रथा को जड़ से खत्म नहीं कर पाए हैं, जो पूरे देश और एक सभ्य समाज के लिए घोर शर्मिंदगी की बात है।
‘चांद तक का सफर तय किया, पर गटर से इंसान को बाहर नहीं निकाल पाए!’
हाई कोर्ट की यह कड़ी टिप्पणी उन दावों की सीधे तौर पर पोल खोलती है जिनमें देश के पूर्ण विकास का ढिंढोरा पीटा जाता है। मामले की सुनवाई करते हुए पीठ ने कड़े और भावुक शब्दों में कहा, “यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और विरोधाभासी है कि आज हम चांद पर पहुंचने का जश्न मना रहे हैं, हमारी तकनीक आसमान छू रही है, लेकिन दूसरी तरफ हम आज भी इंसानों को सीवर और गटर साफ करने के लिए मौत के मुंह में धकेल रहे हैं।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक एक भी गरीब मजदूर इस नरक में उतरने को मजबूर है, तब तक विकास और आधुनिकता के सारे दावे पूरी तरह खोखले हैं।
कागजों पर कानून, लेकिन जमीनी हकीकत में सिर्फ मौत का खेल
कानूनी तौर पर भारत में 2013 के कानून (Prohibition of Employment as Manual Scavengers Act) के तहत हाथ से मैला ढोना और बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर में उतरना पूरी तरह से प्रतिबंधित है और इसे एक दंडनीय अपराध माना गया है। लेकिन प्रशासन की लापरवाही के कारण जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है:
- मशीनों की घोर कमी: कोर्ट ने तीखा सवाल उठाया कि जब हमारे पास दुनिया की बेहतरीन तकनीक मौजूद है, तो सीवर सफाई के लिए 100% मशीनों और रोबोटिक्स का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा है?
- ठेकेदारी प्रथा की जानलेवा आड़: प्रशासन ठेकेदारों के सिर पर पूरी जिम्मेदारी डालकर अपना पल्ला झाड़ लेता है। जब जहरीली गैस (Methane) से दम घुटने के कारण सीवर में किसी मजदूर की दर्दनाक मौत होती है, तो सिर्फ चंद रुपयों का मुआवजा देकर मामले की फाइल बंद कर दी जाती है।
‘कागजी दावों से बाहर निकलिए, हमें ग्राउंड जीरो पर एक्शन चाहिए’
बॉम्बे हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और सभी नगर निगमों को सख्त अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि इस गंभीर मुद्दे पर अब सिर्फ कागजी योजनाएं, समितियां और कोर्ट में पेश किए जाने वाले हलफनामे (Affidavits) बिल्कुल नहीं चलेंगे। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी सूरत में सफाईकर्मियों की जान खतरे में न डाली जाए और उनके पुनर्वास के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
बॉम्बे हाई कोर्ट का यह गुस्सा सिर्फ एक न्यायिक टिप्पणी भर नहीं है, बल्कि उस सिस्टम के गाल पर एक करारा तमाचा है जो ‘स्मार्ट सिटी’ का सपना तो बेचता है, लेकिन अपने ही एक नागरिक को जीने का बुनियादी सम्मान नहीं दे पाता। अदालत का यह रुख साफ चेतावनी है कि अगर अब भी यह कलंक नहीं मिटा, तो प्रशासन को इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।