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आईआईटी मंडी में ‘शूद्र उच्च वर्गों की सेवा करते हैं’ पोस्टर पर भारी विवाद, निदेशक ने कहा- यह छात्रों की अपनी व्याख्या है

अभिषेक सिंह
मंडी / नई दिल्ली

भारत के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में शुमार हिमाचल प्रदेश के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मंडी में एक पोस्टर को लेकर गंभीर वैचारिक और सामाजिक विवाद खड़ा हो गया है। संस्थान प्रशासन इस मामले की जांच कर रहा है कि आईआईटी मंडी के परिसर में ‘शूद्र उच्च वर्गों की सेवा करते हैं’ (Shudras serve higher classes) जैसी टिप्पणी वाला पोस्टर कैसे प्रदर्शित किया गया। इस घटना ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत संवेदनशीलता और प्राचीन ग्रंथों की व्याख्या को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

यह पूरा विवाद एक विशेष पोस्टर के इर्द-गिर्द केंद्रित है। यह विवाद तब भड़का जब “भगवद गीता – द टाइमलेस विजडम” (Bhagavad Gita – The Timeless Wisdom) शीर्षक वाला एक पोस्टर संस्थान के सभागार के बाहर प्रदर्शित किया गया था। इस पोस्टर में समाज को चार वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—में विभाजित किया गया था। आधुनिक शैक्षणिक माहौल में इस तरह के पदानुक्रमित विभाजन को प्रदर्शित करने से छात्रों के एक वर्ग में भारी आक्रोश फैल गया, जिन्होंने इसे समानता के संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन माना।

मामले के तूल पकड़ने के बाद, आईआईटी मंडी के निदेशक को इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण देने के लिए आगे आना पड़ा। पोस्टर की भाषा और उसके निहितार्थों पर जवाब देते हुए, निदेशक ने इस पूरे विवाद का दोष कुछ छात्रों की अपनी व्याख्या (interpretation) पर मढ़ दिया है। हालांकि, एक विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान में ऐसे पोस्टर का लगना कई सवाल खड़े करता है।

प्रशासनिक स्तर पर डैमेज कंट्रोल करते हुए, आईआईटी मंडी के निदेशक लक्ष्मीधर बेहरा (Laxmidhar Behera) ने एक आधिकारिक बयान जारी किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संस्थान “समानता, सामाजिक न्याय, वैज्ञानिक स्वभाव” और संविधान में निहित अन्य सिद्धांतों के मूल्यों को बनाए रखने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।

शैक्षणिक परिसरों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण (scientific temper) को बढ़ावा देना किसी भी आईआईटी का मूल उद्देश्य होता है। ऐसे में, किसी भी प्राचीन ग्रंथ की ऐसी व्याख्या जो समाज के एक वर्ग को ‘सेवा करने वाले’ के रूप में चित्रित करती हो, आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ सीधे टकराव की स्थिति पैदा करती है। यह घटना इस बात की ओर इशारा करती है कि प्रतिष्ठित संस्थानों को अपने परिसरों में होने वाली गतिविधियों और प्रदर्शनियों के प्रति अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है, ताकि सभी छात्रों के लिए एक समावेशी और भेदभाव-रहित माहौल सुनिश्चित किया जा सके।