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एसटी वर्गीकरण को ‘राजनीतिक हेरफेर’ से मुक्त रखने की मांग: वामपंथी संबद्ध आदिवासी निकाय ने कोटा बढ़ाने का प्रस्ताव किया पारित

अभिषेक सिंह
नई दिल्ली

भारत में अनुसूचित जनजाति (एसटी) अधिकारों, उनके आरक्षण और संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर एक राष्ट्रव्यापी बहस फिर से तेज़ हो गई है। हाल ही में नई दिल्ली में एक प्रमुख वामपंथी संबद्ध आदिवासी निकाय द्वारा आयोजित एक विशाल राष्ट्रीय सम्मेलन में जनजातीय अधिकारों के संरक्षण और उनके खिलाफ हो रहे कथित राजनीतिक षड्यंत्रों को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की गई हैं। इस राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान वामपंथी संबद्ध आदिवासी निकाय ने मांग की है कि एसटी वर्गीकरण को ‘राजनीतिक हेरफेर’ से पूरी तरह मुक्त रखा जाना चाहिए और आदिवासियों के लिए निर्धारित कोटे को बढ़ाया जाना चाहिए। यह मांग ऐसे समय में उठी है जब देश के विभिन्न राज्यों में एसटी सूची में नई जातियों को शामिल करने या मौजूदा वर्गीकरण में बदलाव करने को लेकर कई तरह के राजनीतिक आंदोलन और न्यायिक विमर्श चल रहे हैं।

इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा करने और भविष्य की रणनीति तय करने के लिए नई दिल्ली में आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच का राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस प्रतिष्ठित और रणनीतिक सम्मेलन का आयोजन नई दिल्ली के रफी मार्ग स्थित मावलंकर हॉल में किया गया था, जिसका मुख्य विषय “आदिवासी अधिकारों के लिए संघर्ष” था। सम्मेलन में देशभर से आए आदिवासी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और वामपंथी विचारकों ने भाग लिया। इस अवसर पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की वरिष्ठ नेता वृंदा करात भी प्रमुख रूप से उपस्थित थीं और उन्होंने मंच से जनजातीय अधिकारों की पुरजोर वकालत की। उनकी उपस्थिति इस बात को दर्शाती है कि वामपंथी दल आदिवासी मुद्दों को अपने राजनीतिक एजेंडे के मुख्य बिंदु के रूप में देख रहे हैं।

सम्मेलन के दौरान सर्वसम्मति से एक बेहद महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया गया। इस प्रस्ताव में एसटी अधिकारों पर मांगों का एक विस्तृत चार्टर रेखांकित किया गया है, जो मुख्य रूप से संसाधनों, शिक्षा, रोजगार और संस्कृति से संबंधित है। वक्ताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आदिवासी समुदायों के जल, जंगल और ज़मीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर उनके पारंपरिक अधिकारों को कॉरपोरेट घरानों और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त माफियाओं द्वारा लगातार छीना जा रहा है। इसके अलावा, सरकारी नौकरियों में बैकलॉग पदों का न भरा जाना और उच्च शिक्षा में आदिवासी छात्रों के सामने आने वाली बाधाओं को भी इस मांग पत्र में प्रमुखता से उठाया गया है।

आदिवासी नेताओं का आरोप है कि वोट बैंक की राजनीति के तहत कुछ राजनीतिक दल ऐसे समुदायों को भी एसटी सूची में शामिल करने का प्रलोभन दे रहे हैं जो वास्तव में इसके हकदार नहीं हैं। उनका तर्क है कि इस तरह के ‘राजनीतिक हेरफेर’ से मूल और वंचित आदिवासी समुदायों के अधिकारों का हनन होता है। इसलिए, उन्होंने स्पष्ट रूप से यह मांग रखी है कि किसी भी नए वर्गीकरण या सूची में बदलाव को विशुद्ध रूप से वैज्ञानिक, मानवशास्त्रीय और सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन के मानदंडों पर आंका जाना चाहिए, न कि चुनावी फायदों के लिए। इसके साथ ही, आदिवासी आबादी के बढ़ते अनुपात और उनके ऐतिहासिक पिछड़ेपन को ध्यान में रखते हुए आरक्षण के कोटे में आनुपातिक वृद्धि की भी जोरदार वकालत की गई है। यह राष्ट्रीय सम्मेलन आने वाले दिनों में देश भर में एक बड़े आदिवासी आंदोलन की नींव रख सकता है, जो नीति-निर्माताओं पर दबाव बनाने का काम करेगा।