परिसीमन विधेयकों पर रस्साकशी: कांग्रेस का दावा- ‘वेंटिलेटर’ पर है मानसून सत्र, अमित शाह जुटा रहे दो-तिहाई बहुमत

अभिषेक सिंह
नई दिल्ली
भारतीय संसद के मानसून सत्र की स्थिति और परिसीमन जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दे को लेकर देश की राजनीति में एक नया और गहरा विवाद खड़ा हो गया है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने केंद्र सरकार और विशेष रूप से गृह मंत्री की रणनीतियों पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस का आरोप है कि परिसीमन विधेयकों (Delimitation Bills) के लिए दो-तिहाई बहुमत (two-thirds majority) जुटाने के उद्देश्य से गृह मंत्री अमित शाह (Shah) के प्रयासों के बीच मानसून सत्र को ‘वेंटिलेटर’ (‘ventilator’) पर रखा गया है। यह राजनीतिक गतिरोध संसदीय प्रक्रियाओं के उपयोग और विधायी रणनीतियों को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश (Congress general secretary Jairam Ramesh) ने इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे संसदीय इतिहास की एक असामान्य घटना करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि 13 अगस्त को दोनों सदनों की कार्यवाही अनिश्चित काल के लिए (sine die) स्थगित कर दी गई थी। जयराम रमेश ने कहा कि 13 अगस्त के इस स्थगन के 25 दिन बीत जाने के बाद भी (25 days after), सत्र का सत्रावसान (prorogued) न होना बेहद असामान्य (unusual) है। संसदीय नियमों के अनुसार, जब सदनों को अनिश्चित काल के लिए स्थगित किया जाता है, तो उसके कुछ ही दिनों के भीतर राष्ट्रपति द्वारा औपचारिक रूप से सत्रावसान (Prorogation) की अधिसूचना जारी कर दी जाती है, जिससे वह सत्र आधिकारिक रूप से समाप्त हो जाता है।
लेकिन इस बार सत्रावसान न होने का मतलब है कि मानसून सत्र तकनीकी रूप से अभी भी ‘जीवित’ है। विपक्षी दलों का मानना है कि सरकार ने यह तकनीकी चाल जानबूझकर चली है, ताकि परिसीमन से जुड़े किसी भी महत्वपूर्ण विधेयक को पारित कराने के लिए आवश्यकता पड़ने पर सदनों को तुरंत और बिना किसी लंबी औपचारिक प्रक्रिया के दोबारा बुलाया जा सके। परिसीमन (Delimitation) एक ऐसा मुद्दा है जो देश भर में लोकसभा और विधानसभा सीटों के पुनर्निर्धारण से जुड़ा है, और इसका सीधा असर उत्तर और दक्षिण भारत के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है। संविधान में ऐसे किसी भी बड़े बदलाव के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, जिसे जुटाने के लिए सरकार कथित तौर पर समय ले रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, सत्र को ‘वेंटिलेटर’ पर रखने की इस रणनीति से सरकार को विपक्ष से बातचीत करने और पर्दे के पीछे राजनीतिक समीकरण साधने का अतिरिक्त समय मिल रहा है। यदि सत्र का सत्रावसान हो जाता है, तो नया सत्र बुलाने के लिए कैबिनेट की सिफारिश और राष्ट्रपति की मंज़ूरी सहित कई लंबी प्रक्रियाएं पूरी करनी पड़ती हैं। इसके विपरीत, यदि सत्र केवल ‘साइन डाई’ (sine die) स्थगित है, तो पीठासीन अधिकारी सरकार के अनुरोध पर सदस्यों को कुछ ही दिनों के नोटिस पर वापस बुला सकते हैं।
कांग्रेस द्वारा लगाए गए ये आरोप स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि परिसीमन को लेकर विपक्षी दलों में भारी बेचैनी और अविश्वास का माहौल है। विपक्ष को डर है कि सरकार अपने संख्या बल और राजनीतिक प्रबंधन के दम पर कोई ऐसा विधेयक न ले आए, जो भविष्य के चुनावी परिदृश्य को पूरी तरह से बदल कर रख दे। फिलहाल, सभी की निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं कि वह इस ‘जीवित’ मानसून सत्र का उपयोग किस प्रकार के विधायी कार्यों के लिए करती है और क्या वास्तव में परिसीमन पर कोई ऐतिहासिक विधेयक सदन के पटल पर रखा जाएगा या नहीं।