भारत रत्न प्रो. सी.एन.आर. राव को ‘नाम बेमेल’ होने पर मिला नोटिस: नौकरशाही की लापरवाही और डिजिटलीकरण की खामियों का एक और उदाहरण

विवेक ओझा
बेंगलुरु
भारत में सरकारी दफ्तरों की लालफीताशाही, लिपिकीय त्रुटियां (clerical errors) और डिजिटल डेटाबेस की खामियां अक्सर आम आदमी के लिए भारी परेशानी का सबब बनती हैं। लेकिन यह प्रशासनिक विडंबना तब और भी अधिक हास्यास्पद और चिंताजनक हो जाती है, जब देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित एक विश्वविख्यात हस्ती को भी ऐसी ही तुच्छ और बेतुकी कागज़ी कार्रवाइयों का सामना करना पड़े। ताज़ा मामला भारत के सबसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों में से एक का है। भारत रत्न प्रोफेसर सी.एन.आर. राव को उनके नाम में बेमेल (name mismatch) होने के कारण एक आधिकारिक नोटिस दिया गया है। यह घटना प्रशासनिक संवेदनहीनता का एक जीता-जागता प्रमाण है।
प्रोफेसर चिंतामणि नागेश रामचंद्र राव (C.N.R. Rao) रसायन विज्ञान के क्षेत्र में एक ऐसा नाम है जो दुनिया भर के वैज्ञानिक हलकों में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में शहर (बेंगलुरु) और देश के लिए अत्यधिक योगदान दिया है। उनके नाम पर दर्जनों पेटेंट और हज़ारों शोध पत्र दर्ज हैं। इसके बावजूद, प्रशासनिक मशीनरी ने उनके कद का ज़रा भी खयाल न करते हुए उन्हें एक ऐसा नोटिस थमा दिया जो पूरी तरह से व्यवस्था की अपनी ही गलती का परिणाम है।
इस अजीबोगरीब नोटिस के विवरण पर गौर करें तो समस्या की जड़ पूरी तरह से लिपिकीय दिखाई देती है। प्रो. राव को यह नोटिस ‘स्वयं के नाम में बेमेल’ (self-name mismatch) के कारण जारी किया गया है। नोटिस के पीछे का कारण बताते हुए स्पष्ट किया गया है कि पुराने रिकॉर्ड या रोल में उन्हें “प्रो. सी.एन.आर. राव” (Prof. C.N.R. Rao) के रूप में दर्शाया गया था, जबकि वर्तमान रिकॉर्ड में एक अतिरिक्त ‘f’ जोड़ दिया गया है, जिससे उनका नाम “प्रोफ. सी.एन.आर. राव” (Proff. C.N.R. Rao) दर्ज हो गया है। “Professor” के संक्षिप्त रूप “Prof.” में एक अतिरिक्त ‘f’ लगाकर उसे “Proff.” बना देना स्पष्ट रूप से डेटा एंट्री ऑपरेटर की स्पेलिंग की गलती है।
लेकिन इसी छोटी सी टाइपिंग मिस्टेक के कारण सिस्टम ने एक स्वचालित ‘मिसमैच’ (mismatch) उत्पन्न कर दिया और एक 90 वर्षीय भारत रत्न को अपनी पहचान साबित करने के लिए नोटिस भेज दिया गया। यह घटना इस बात पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है कि क्या हमारे डिजिटल सिस्टम पूरी तरह से अंधे और संवेदनहीन हो चुके हैं? क्या सरकारी विभागों में डेटा सत्यापन (Data Verification) का कोई ऐसा मानवीय तंत्र नहीं है जो इस तरह की हास्यास्पद विसंगतियों को नोटिस जारी होने से पहले ही रोक सके?
जब पेंशन, चुनाव पहचान पत्र, या कर दस्तावेज़ों में इस तरह की छोटी-छोटी अशुद्धियां होती हैं, तो आम नागरिकों को सरकारी दफ्तरों के कई चक्कर काटने पड़ते हैं। प्रो. राव के मामले ने इस समस्या को राष्ट्रीय पटल पर ला दिया है। यह आवश्यक है कि डिजिटल इंडिया के दौर में डेटाबेस को अधिक स्मार्ट (Smart) और संदर्भ-जागरूक (Context-aware) बनाया जाए। एक अतिरिक्त अक्षर जुड़ने से किसी व्यक्ति की मूल पहचान नहीं बदल जाती। नागरिक संगठनों और शिक्षाविदों ने इस घटना पर गहरी निराशा व्यक्त करते हुए मांग की है कि संबंधित विभाग को तुरंत यह त्रुटि सुधारनी चाहिए और प्रोफेसर राव को हुई इस असुविधा के लिए औपचारिक रूप से खेद व्यक्त करना चाहिए।