Trending

सत्य निकेतन इमारत ढहने की त्रासदी: छात्रों का आरोप- मौतों का आंकड़ा गलत बताया गया, दहशत में खाली कर रहे पीजी

राघवेन्द्र प्रताप सिंह
नई दिल्ली

भारत की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अनियोजित शहरीकरण और अवैध निर्माण का खामियाजा अक्सर निर्दोष नागरिकों, विशेषकर छात्रों को भुगतना पड़ता है। हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास स्थित एक बेहद घनी और छात्र-बहुल बस्ती में हुए एक भयानक हादसे ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। 6 सितंबर, 2026 को दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास सत्य निकेतन पीजी इमारत के ढहने की घटना सामने आई थी। इस बहुमंजिला इमारत के ताश के पत्तों की तरह ढह जाने से न केवल जान-माल का भारी नुकसान हुआ, बल्कि इसने पूरे इलाके में रहने वाले हज़ारों छात्रों के मन में गहरा खौफ पैदा कर दिया है।

इस त्रासदी के बाद स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने राहत एवं बचाव कार्य शुरू किया था। ताज़ा अपडेट के अनुसार, पुलिस ने सत्य निकेतन पीजी ढहने वाले स्थान पर खोज और बचाव अभियान अब समाप्त कर दिया है। हालांकि, बचाव कार्य समाप्त होने का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि स्थानीय लोगों और छात्रों का गुस्सा शांत हो गया है। इसके विपरीत, प्रशासन द्वारा जारी किए गए आधिकारिक आंकड़ों को लेकर एक बहुत बड़ा और गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। सत्य निकेतन इमारत के ढहने के बाद, छात्रों ने आरोप लगाया है कि मरने वालों की संख्या को ‘गलत तरीके से’ पेश (misreported) किया गया है।

छात्रों का दावा है कि जिस समय यह पीजी इमारत ढही, उस समय वहां रहने वाले और काम करने वाले लोगों की संख्या आधिकारिक आंकड़ों से कहीं अधिक थी। प्रशासन की पारदर्शिता पर अविश्वास जताते हुए और सच्चाई सामने लाने की मांग को लेकर, लगभग 150 छात्रों ने हताहतों का पूरा डेटा जारी करने की मांग को लेकर एक अनिश्चितकालीन विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। इन छात्रों का मानना है कि मामले को रफा-दफा करने और नगर निगम के अधिकारियों की लापरवाही को छिपाने के लिए मौतों और घायलों की वास्तविक संख्या को छुपाया जा रहा है।

इस हादसे के तुरंत बाद, नगर निगम और स्थानीय प्रशासन ने अचानक नींद से जागते हुए इलाके की अन्य खस्ताहाल और अवैध इमारतों पर भी कार्रवाई शुरू कर दी है। अधिकारियों द्वारा असुरक्षित और अवैध ढांचों के खिलाफ कदम उठाए जाने के बीच, सत्य निकेतन में एक बड़े पैमाने पर पलायन देखा जा रहा है। डर और अनिश्चितता के माहौल में, सैकड़ों छात्र अपने पीजी खाली कर रहे हैं और अपना सामान लेकर सत्य निकेतन छोड़ रहे हैं। सड़कों पर अपने बैग और गद्दों के साथ बैठे ये छात्र भारत की शिक्षा व्यवस्था और शहरी बुनियादी ढांचे की एक बेहद डरावनी और दुखद तस्वीर पेश करते हैं।

सत्य निकेतन जैसे इलाके देशभर से आए उन छात्रों का ठिकाना होते हैं जो सीमित बजट में अपनी उच्च शिक्षा पूरी करने दिल्ली आते हैं। मकान मालिकों की लालच और प्रशासन की मिलीभगत के कारण पुरानी इमारतों पर बिना किसी सुरक्षा ऑडिट के अतिरिक्त मंजिलें खड़ी कर दी जाती हैं। छात्रों का यह अनिश्चितकालीन विरोध प्रदर्शन सिर्फ एक इमारत के गिरने का गुस्सा नहीं है, बल्कि यह वर्षों से चली आ रही उस व्यवस्था के खिलाफ एक विद्रोह है जो छात्रों के जीवन को दांव पर लगाती है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या प्रशासन छात्रों के दबाव में आकर एक निष्पक्ष जांच बिठाता है और क्या इन बेघर हुए छात्रों के सुरक्षित पुनर्वास के लिए कोई त्वरित और ठोस कदम उठाया जाता है।