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दिल्ली में मतदाता सूची से नामों के सफाए पर बड़ा विवाद: प्री-SIR मैपिंग चरण में काटे गए 13 लाख मतदाताओं के नाम

द इंडियन व्यू टीम
नई दिल्ली

भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में चुनाव सबसे अहम त्योहार माना जाता है, लेकिन दिल्ली में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण के दौरान सामने आए आंकड़ों ने एक बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक संकट को जन्म दे दिया है। चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करने वाली एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में ‘प्री-एसआईआर मैपिंग’ (pre-SIR mapping phase) चरण के दौरान भारी संख्या में यानी 13 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा (deleted) दिए गए हैं, जो कि ‘फेज-3’ (Phase-3) के राज्यों में सबसे अधिक है। इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं का नाम अचानक सूची से गायब होना एक बेहद चिंताजनक स्थिति है, जो चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा करती है।

इस मामले में सबसे चौंकाने वाला तथ्य इन नामों को हटाने की समय सीमा है। आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि 2025 के पूरे 11 महीनों की तुलना में, अकेले जनवरी 2026 में ही अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं (January 2026 alone accounted for more deletions than 11 months of 2025)। एक ही महीने में इतनी जल्दबाज़ी में की गई इस छंटनी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, चुनाव अधिकारियों ने अपने बचाव में यह तर्क दिया है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से सामान्य है और यह मतदाता सूचियों के “निरंतर अद्यतनीकरण” (continuous updation of rolls) का हिस्सा है।

लेकिन अधिकारियों का यह स्पष्टीकरण कई नागरिक अधिकार समूहों और राजनीतिक दलों को संतुष्ट करने में विफल रहा है। विवाद का मुख्य कारण प्रशासनिक पारदर्शिता की कमी है। इस बड़े पैमाने पर नामों के हटाए जाने (mass deletions) के पीछे के कारणों को स्पष्ट करते हुए कोई अलग सूची (no separate list) प्रकाशित नहीं की गई है। आमतौर पर जब किसी मतदाता का नाम डुप्लीकेशन (दोहरी प्रविष्टि), मृत्यु, या स्थानांतरण के कारण हटाया जाता है, तो उसे बाकायदा कारण सहित नोटिफाई किया जाता है। कारण न बताने से यह संदेह गहरा गया है कि क्या इस प्रक्रिया में उन लोगों को भी निशाना बनाया गया है जो नियमित रूप से चुनावों में मतदान (regularly voting in elections) करते रहे हैं।

ज़मीनी स्तर पर यह काम बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) द्वारा किया जाता है। ताज़ा तस्वीरों में देखा जा सकता है कि कैसे एक बूथ लेवल अधिकारी (Booth Level Officer) दिल्ली के उत्तम नगर के पास विकास नगर के भीम एन्क्लेव (Bhim Enclave, Vikas Nagar near Uttam Nagar) में मतदाता सूचियों के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (Special Intensive Revision of electoral rolls) के दौरान डोर-टू-डोर (door to door) मतदाता गणना अभियान चला रहे हैं। इस गहन पुनरीक्षण के बावजूद 13 लाख जैसे विशाल आंकड़े का सामने आना इस बात की ओर इशारा करता है कि या तो दिल्ली का जनसांख्यिकीय डेटा बुरी तरह से पुराना था, या फिर इस नई मैपिंग प्रक्रिया के एल्गोरिदम में कोई बड़ी खामी है, जिसने लाखों योग्य नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों को खतरे में डाल दिया है। चुनाव आयोग पर अब इन डिलीट हुए नामों की विस्तृत और पारदर्शी सूची जारी करने का भारी दबाव है।