कपड़े हटाना, छूना या घर में घुसना… कब माना जाएगा रेप का प्रयास? कोर्ट के फैसलों से समझिए

नई दिल्ली। किसी भी गंभीर अपराध के बाद पीड़ित न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाता है। यौन अपराधों, खासकर रेप और बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा के मामलों में अदालतों के फैसले का असर केवल आरोपी और पीड़ित तक सीमित नहीं रहता। ऐसे मामलों में न्यायिक व्याख्या यह भी प्रभावित करती है कि कानून महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा, गरिमा और अधिकारों को किस तरह देखता है।पिछले कुछ वर्षों में अलग-अलग हाई कोर्ट के कुछ फैसलों और टिप्पणियों को लेकर इसी वजह से व्यापक बहस हुई है। इनमें रेप के प्रयास और तैयारी के बीच अंतर, यौन अपराध की कानूनी परिभाषा और POCSO के तहत ‘यौन हमला’ जैसे मुद्दे शामिल रहे हैं। कुछ मामलों में हाई कोर्ट की व्याख्याओं को बाद में सुप्रीम कोर्ट ने बदल दिया या खारिज कर दिया।झारखंड हाई कोर्ट का मामला फिर चर्चा मेंहाल में झारखंड हाई कोर्ट के एक फैसले को लेकर भी बहस तेज हुई। मामले में आरोपी पर रात में एक महिला के घर में घुसने, उसे पकड़ने और उसके कपड़े उठाने जैसे आरोप थे। अदालत ने कहा कि केवल इन परिस्थितियों से अपने आप रेप के प्रयास का अपराध साबित नहीं होता। इसके लिए यह देखना जरूरी है कि आरोपी ने रेप को अंजाम देने की दिशा में कोई ऐसा प्रत्यक्ष कदम उठाया था या नहीं, जो अपराध पूरा करने की कोशिश को दर्शाता हो।यह मामला इसलिए चर्चा में आया क्योंकि इसमें कथित यौन हिंसा और रेप के प्रयास के बीच कानूनी अंतर पर सवाल उठे। अदालतों के सामने अक्सर यह तय करने की चुनौती होती है कि आरोपी का कृत्य केवल तैयारी के स्तर पर था या उसने अपराध को पूरा करने की दिशा में पर्याप्त प्रत्यक्ष कदम उठा लिया था।किन फैसलों पर हुई बहस?यौन अपराधों से जुड़े कुछ पुराने मामलों में भी अदालतों की टिप्पणियों को लेकर विवाद सामने आया है। इनमें प्रमुख रूप से—इलाहाबाद हाई कोर्ट: रेप के प्रयास और तैयारी के बीच अंतर को लेकर फैसला।पटना हाई कोर्ट: महिला के कपड़े हटाने और उसके साथ कथित यौन व्यवहार को रेप के प्रयास की कानूनी कसौटी पर परखा गया।बॉम्बे हाई कोर्ट: POCSO मामले में ‘स्किन-टू-स्किन’ संपर्क को लेकर विवादित व्याख्या।झारखंड हाई कोर्ट: घर में घुसने, महिला को पकड़ने और कपड़े उठाने को रेप के प्रयास के लिए पर्याप्त मानने के सवाल पर टिप्पणी।छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट: पेनिट्रेशन और रेप के प्रयास के बीच कानूनी अंतर को लेकर फैसला।इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पलटारेप के प्रयास और तैयारी के बीच अंतर को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट का एक फैसला भी काफी चर्चा में रहा। मामले में आरोपी पर नाबालिग लड़की के साथ यौन हरकत करने और उसके कपड़े नीचे करने की कोशिश का आरोप था। हाई कोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए इसे रेप के प्रयास के बजाय तैयारी के स्तर का कृत्य माना था।बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की व्याख्या को बदलते हुए कहा कि यदि आरोपी ने अपराध को अंजाम देने की दिशा में पर्याप्त और प्रत्यक्ष कदम उठा लिया है, लेकिन किसी बाहरी कारण से अपराध पूरा नहीं हो पाया, तो उसे केवल ‘तैयारी’ कहकर सीमित नहीं किया जा सकता।इस फैसले ने यह स्पष्ट करने में मदद की कि अदालत को आरोपी की मंशा के साथ-साथ उसके वास्तविक कृत्यों और अपराध पूरा करने की दिशा में उठाए गए कदमों को भी देखना होता है।‘स्किन-टू-स्किन’ मामलाबॉम्बे हाई कोर्ट का POCSO से जुड़ा एक फैसला भी देशभर में चर्चा का विषय बना था। अदालत की तत्कालीन व्याख्या में बच्चे के संवेदनशील हिस्से को कपड़े के ऊपर से छूने के मामले में ‘स्किन-टू-स्किन’ संपर्क को लेकर सवाल उठाया गया था।इस व्याख्या पर व्यापक आपत्ति जताई गई और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की संकीर्ण व्याख्या को स्वीकार नहीं किया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि POCSO का उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण से सुरक्षा देना है और किसी यौन कृत्य की गंभीरता का आकलन केवल त्वचा के सीधे संपर्क के आधार पर नहीं किया जा सकता।पटना हाई कोर्ट और छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के मामलेपटना हाई कोर्ट के एक मामले में आरोपी पर महिला के साथ जबरदस्ती करने, उसके कपड़े हटाने की कोशिश और उसके शरीर को दबाने जैसे आरोप थे। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और आरोपी के कृत्यों को देखते हुए यह जांचा कि क्या वे रेप के प्रयास की कानूनी कसौटी पूरी करते हैं। मामले में अदालत ने कृत्य को महिला की मर्यादा भंग से संबंधित अपराध के रूप में देखा।इसी तरह छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के एक मामले में रेप और रेप के प्रयास के बीच अंतर पर विचार किया गया। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पूर्ण दुष्कर्म साबित नहीं होने की स्थिति में अपराध की कानूनी श्रेणी और सजा पर विचार किया। इस तरह के फैसले यह दिखाते हैं कि अदालतों के सामने केवल घटना की गंभीरता नहीं, बल्कि कानून में निर्धारित अपराध के तत्वों को साबित करने की जिम्मेदारी भी होती है।अब न्यायिक भाषा और संवेदनशीलता पर भी जोरयौन अपराधों से जुड़े मामलों में सिर्फ कानूनी निष्कर्ष ही नहीं, बल्कि अदालतों की भाषा और पीड़ित के प्रति संवेदनशीलता भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इसी संदर्भ में जजों के लिए लैंगिक संवेदनशीलता और न्यायिक भाषा से जुड़ी गाइडलाइंस पर जोर बढ़ा है।मद्रास हाई कोर्ट ने यौन अपराधों और संवेदनशील पीड़ितों से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाले जजों के लिए ‘Judgments and Gender’ नाम की हैंडबुक भी जारी की है। इसमें पीड़ितों की सुरक्षा, मुआवजा, कोर्टरूम व्यवहार और गवाही से जुड़े दिशा-निर्देश शामिल हैं। हैंडबुक में ऐसे शब्दों और टिप्पणियों से बचने पर जोर दिया गया है, जिनसे पीड़ित को दोषी ठहराने या उसके प्रति पूर्वाग्रह का संकेत मिले।असली सवाल: कानून की सख्ती और न्यायिक संवेदनशीलता में संतुलनइन मामलों को केवल ‘अदालत बनाम पीड़ित’ के नजरिए से देखना सही नहीं होगा। अदालतों की जिम्मेदारी कानून में तय तत्वों के आधार पर अपराध साबित करना है, जबकि समाज की अपेक्षा है कि यौन हिंसा के मामलों में पीड़ित की गरिमा और सुरक्षा को भी पूरी संवेदनशीलता के साथ देखा जाए।जहां अदालतें आरोपी के अधिकारों और सबूतों की कानूनी कसौटी को नजरअंदाज नहीं कर सकतीं, वहीं यौन अपराधों की सुनवाई में भाषा और व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जिससे कानून के उद्देश्य को गलत संदेश न जाए।आखिरकार, किसी भी फैसले की असली कसौटी यही है कि वह कानून की स्पष्टता, आरोपी के अधिकार, पीड़ित की गरिमा और न्याय—इन चारों के बीच कितना संतुलन स्थापित करता है। यही वजह है कि यौन अपराधों से जुड़े फैसलों में सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट व्याख्याएं और न्यायिक संवेदनशीलता से जुड़े दिशानिर्देश आगे के मामलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।