ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि

अभिषेक सिंह / नई दिल्ली: वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में एक बहुत बड़े और दूरगामी परिवर्तन की नींव रखी जा रही है, जहां उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं पश्चिमी देशों के वित्तीय एकाधिकार को चुनौती देने के लिए एकजुट हो रही हैं। वर्तमान भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक परिदृश्य में, ब्रिक्स (BRICS) देशों के बीच व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। यह वृद्धि केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इन राष्ट्रों के बीच बढ़ती रणनीतिक और आर्थिक आत्मनिर्भरता का एक स्पष्ट प्रमाण है।
अंतर-ब्रिक्स व्यापार (intra-BRICS trade) में हो रही यह निरंतर वृद्धि एक सीमा-पार भुगतान प्रणाली (cross-border payments system) के मामले को और अधिक मजबूत करती है। वर्तमान में, दुनिया भर का अधिकांश अंतरराष्ट्रीय व्यापार स्विफ्ट (SWIFT) प्रणाली और अमेरिकी डॉलर के माध्यम से संचालित होता है। लेकिन ब्रिक्स देशों के बीच आपसी व्यापार बढ़ने से अब एक ऐसे स्वतंत्र वित्तीय नेटवर्क की आवश्यकता महसूस की जा रही है, जो किसी एक महाशक्ति के प्रतिबंधों या नीतियों से मुक्त हो। एक साझा क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम विकसित करने से न केवल लेन-देन की लागत कम होगी, बल्कि व्यापार की गति और सुरक्षा में भी भारी इज़ाफा होगा।
इस दिशा में आर्थिक सहयोग को और अधिक ज़मीनी स्तर पर ले जाने के लिए, नई दिल्ली में ब्रिक्स मेले (BRICS fair) का आयोजन किया जाएगा। यह मेला सदस्य देशों के उद्योगपतियों, निवेशकों और नीति निर्माताओं को एक साझा मंच प्रदान करेगा, जहां वे नए व्यापारिक अवसरों की तलाश कर सकेंगे और तकनीकी व औद्योगिक सहयोग को बढ़ावा दे सकेंगे। इस मेले का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों की राष्ट्रीय मुद्राओं (national currencies) को मजबूत करना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार की वार्ताओं में आर्थिक कूटनीति सबसे अहम भूमिका निभाएगी। चर्चाओं के एक प्रमुख हिस्से के रूप में अमेरिकी डॉलर पर वैश्विक निर्भरता को कम करने (Reducing global dependence on the U.S. dollar) के मुद्दे पर व्यापक विचार-विमर्श होने की उम्मीद है। ‘डी-डॉलराइजेशन’ (De-dollarization) अब केवल एक वैचारिक अवधारणा नहीं रह गई है, बल्कि रूस और चीन जैसे देश इसे सक्रिय रूप से लागू कर रहे हैं। भारत भी अपने रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण के लिए कई देशों के साथ स्थानीय मुद्रा में व्यापार समझौते कर रहा है। जब ब्रिक्स जैसे शक्तिशाली समूह के देश, जो विश्व की एक बड़ी आबादी और जीडीपी का प्रतिनिधित्व करते हैं, डॉलर के बजाय अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार करना शुरू करेंगे, तो इसका सीधा असर वैश्विक वित्तीय संरचना पर पड़ेगा।
यह विकासशील देशों के लिए एक बहुत बड़ा अवसर है। ब्रिक्स का विस्तार होने के बाद से इस समूह की आर्थिक ताकत कई गुना बढ़ गई है। नई दिल्ली में होने वाले इस मेले और आगामी बैठकों में यदि क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम के ढांचे पर कोई ठोस सहमति बन जाती है, तो यह विश्व व्यापार संगठन (WTO) और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) जैसी पारंपरिक संस्थाओं के समानांतर एक नई और अधिक न्यायसंगत आर्थिक विश्व व्यवस्था का निर्माण करेगा। कुल मिलाकर, ब्रिक्स देशों का यह कदम पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रभुत्व के लिए एक स्पष्ट और मजबूत चुनौती है।