ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का नई दिल्ली आगमन

विवेक ओझा / नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य और बदलते आर्थिक समीकरणों के लिहाज़ से भारत की राजधानी नई दिल्ली इस समय पूरी दुनिया की नज़रों के केंद्र में बनी हुई है। एक अत्यधिक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कूटनीतिक घटनाक्रम के तहत, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Russian President Vladimir Putin) बहुप्रतीक्षित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS summit) में भाग लेने के लिए नई दिल्ली पहुंच गए हैं। राष्ट्रपति पुतिन ने इस अहम अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए शुक्रवार, 11 सितंबर, 2026 को भारत की अपनी तीन दिवसीय यात्रा की शुरुआत की। उनकी इस यात्रा के बहुत गहरे भू-राजनीतिक निहितार्थ हैं।
नई दिल्ली में आयोजित हो रहा यह 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन कोई सामान्य कूटनीतिक जमावड़ा नहीं है। यह सम्मेलन एक ऐसे समय में हो रहा है जब पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था एक अभूतपूर्व संकट, ध्रुवीकरण और अनिश्चितता के दौर से गुज़र रही है। यह शिखर सम्मेलन रूस-यूक्रेन युद्ध (Russia-Ukraine war) के प्रतिकूल प्रभावों का लगातार सामना कर रही वैश्विक अर्थव्यवस्था की पृष्ठभूमि में हो रहा है। वर्षों से चल रहे इस विनाशकारी युद्ध ने ऊर्जा बाज़ारों, वैश्विक खाद्य सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं को बुरी तरह से बाधित कर दिया है।
इस आर्थिक अस्थिरता को पश्चिम एशिया के गहराते संकट (West Asia crisis) ने और भी अधिक नाज़ुक बना दिया है। विशेष रूप से, होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी (blockade of the Strait of Hormuz) ने वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति को एक बहुत बड़े खतरे में डाल दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल चोकपॉइंट है, और यहां किसी भी प्रकार की सैन्य या रणनीतिक नाकेबंदी सीधे तौर पर दुनिया भर के देशों में भारी मुद्रास्फीति (महंगाई) को बढ़ा सकती है।
इन सुरक्षा चुनौतियों के अतिरिक्त, शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी व्यापार नीतियों के प्रभाव पर भी गहरी चर्चा होने की प्रबल संभावना है। ट्रम्प प्रशासन की आक्रामक व्यापार और टैरिफ नीतियों (Trump administration’s trade and tariff policies) ने विकासशील और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के सामने कई नई व्यापारिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। संरक्षणवाद (Protectionism) के इस बढ़ते वैश्विक रुझान के बीच, ब्रिक्स देशों के लिए आपसी व्यापार को बढ़ावा देना और एक-दूसरे की अर्थव्यवस्थाओं का मज़बूती से समर्थन करना अब एक अनिवार्यता बन गया है।
इन तमाम वैश्विक उथल-पुथल के बीच व्लादिमीर पुतिन की नई दिल्ली यात्रा यह स्पष्ट संदेश देती है कि रूस कूटनीतिक रूप से अलग-थलग नहीं है और ब्रिक्स जैसे शक्तिशाली मंचों के माध्यम से ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को लगातार मज़बूत कर रहा है। भारत के लिए भी यह एक बड़ी कूटनीतिक परीक्षा है, जहां उसे पश्चिमी सहयोगियों के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को संतुलित करते हुए रूस के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों को साधना है।