BRICS Membership 2026: पाकिस्तान की ब्रिक्स सदस्यता पर क्यों लगा है ताला? जानिए भारत के वीटो और वैश्विक राजनीति की पूरी कहानी

New Delhi : ब्रिक्स (BRICS) समूह का वैश्विक प्रभाव लगातार तेजी से बढ़ रहा है, जिसके चलते दुनिया के कई देश इस संगठन का हिस्सा बनने के लिए कतार में हैं। इसी कड़ी में पाकिस्तान ने भी साल 2023 के अंत में ब्रिक्स की पूर्ण सदस्यता के लिए आधिकारिक आवेदन किया था। हालांकि, तमाम कोशिशों और चीन-रूस जैसे बड़े देशों के समर्थन के बावजूद पाकिस्तान की यह हसरत अब तक पूरी नहीं हो पाई है और उसकी सदस्यता का रास्ता पूरी तरह से बंद नजर आ रहा है।पाकिस्तान की आर्थिक तंगी और ब्रिक्स का आकर्षणपाकिस्तान लंबे समय से गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। आधिकारिक पाकिस्तान इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक, देश की जीडीपी ग्रोथ महज 3.70 प्रतिशत के आसपास रही है, जिसके चलते वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक पर अपनी निर्भरता को कम करना चाहता है। पाकिस्तान को उम्मीद है कि ब्रिक्स जैसे ताकतवर आर्थिक मंच का हिस्सा बनने से उसे वैश्विक स्तर पर फंडिंग के नए विकल्प मिलेंगे और बड़े सदस्य देशों के साथ व्यापारिक सहयोग बढ़ाने में मदद मिलेगी। अपनी इसी रणनीति के तहत पाकिस्तान ने ब्रिक्स से जुड़े ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ (NDB) में करीब 580 मिलियन डॉलर की हिस्सेदारी भी खरीदी है।भारत की ‘ना’ बनी सबसे बड़ी दीवारब्रिक्स समूह का एक कड़ा नियम यह है कि किसी भी नए देश को शामिल करने के लिए संगठन के सभी मौजूदा सदस्य देशों की पूर्ण सहमति (सर्वसम्मति) होना अनिवार्य है। यदि कोई एक देश भी आपत्ति जताता है, तो नए सदस्य की एंट्री रुक जाती है। पाकिस्तान के मामले में भारत की कड़ी आपत्ति सबसे बड़ा अवरोध साबित हुई है। आतंकवाद और अन्य भू-राजनीतिक कारणों से भारत ने पाकिस्तान की उम्मीदवारी पर साफ असहमति जताई है, जिसके कारण ब्रिक्स मंच पर पाकिस्तान का मामला आगे नहीं बढ़ पा रहा है।चीन और रूस का समर्थन भी नहीं आया कामपाकिस्तान को अपनी इस कूटनीतिक कोशिश में चीन और रूस का साथ जरूर मिला था। रूस में पाकिस्तान के तत्कालीन राजदूत मुहम्मद खालिद जमाली ने रूसी मीडिया एजेंसी TASS को दिए साक्षात्कार में स्वीकार किया था कि पाकिस्तान ब्रिक्स देशों से अपने पक्ष में समर्थन जुटा रहा है और उसने रूस से भी आधिकारिक तौर पर मदद मांगी है। बीजिंग ने भी पाकिस्तान के प्रति नरम रुख दिखाया, लेकिन ब्रिक्स के आंतरिक नियमों और आम सहमति की अनिवार्यता के आगे चीन-रूस का यह समर्थन भी बेअसर साबित हुआ।ग्लोबल साउथ में ब्रिक्स का बढ़ता वर्चस्वपाकिस्तान की बेचैनी की मुख्य वजह ब्रिक्स का लगातार फैलता दायरा है। विस्तार के बाद ब्रिक्स में दुनिया की करीब 49 फीसदी आबादी शामिल हो चुकी है, और क्रय शक्ति समता (PPP) के आधार पर यह समूह वैश्विक जीडीपी का लगभग 40 फीसदी हिस्सा नियंत्रित करता है। भारत का इन देशों के साथ व्यापार भी तेजी से बढ़ा है, जहां सदस्य देशों को होने वाला भारतीय निर्यात 48.8 फीसदी की छलांग लगाकर 95.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। यही कारण है कि पाकिस्तान हर हाल में इस हाई-प्रोफाइल संगठन का हिस्सा बनना चाहता है, लेकिन भारत के कड़े रुख और सर्वसम्मति के अभाव में उसकी यह राह फिलहाल असंभव बनी हुई है।