सड़क सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: सड़क मंत्रालय को सीट बेल्ट और बाल सुरक्षा नियमों के खराब कार्यान्वयन की जांच के दिए निर्देश

फैंसी सीट कवर सुरक्षा उपकरणों की ले रहे हैं जगह; संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार को बताया खतरे में
सरिता त्रिपाठी/ नई दिल्ली: भारत की सड़कों पर हर साल लाखों लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में होती है। इन मौतों का एक बहुत बड़ा कारण वाहनों में मौजूद सुरक्षा उपकरणों का उपयोग न करना या उनके साथ अवांछित छेड़छाड़ करना है। इस गंभीर राष्ट्रीय संकट का स्वतः संज्ञान लेते हुए और नागरिकों के जीवन की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक बेहद सख्त आदेश पारित किया है। सुप्रीम कोर्ट ने सड़क मंत्रालय को सीट बेल्ट और बाल सुरक्षा नियमों के खराब कार्यान्वयन की जांच करने के लिए कहा है। अदालत का यह निर्देश स्पष्ट करता है कि केवल सुरक्षा कानून बना देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि ज़मीनी स्तर पर उनका कड़ाई से पालन होना भी उतना ही आवश्यक है।
आजकल कारों के इंटीरियर को खूबसूरत और ‘प्रीमियम’ दिखाने की होड़ में कार मालिक अक्सर ऐसी एक्सेसरीज़ का इस्तेमाल करते हैं जो कार के इन-बिल्ट सेफ्टी मैकेनिज्म को पूरी तरह से निष्क्रिय कर देती हैं। विशेष रूप से आफ्टरमार्केट (aftermarket) फैंसी सीट कवर लगाने से अक्सर रियर सीट बेल्ट के बकल छिप जाते हैं और साइड एयरबैग के खुलने का रास्ता भी अवरुद्ध हो जाता है। इस मामले को अदालत में उठाते हुए याचिकाकर्ता ने एक बहुत ही गंभीर और व्यावहारिक समस्या की ओर इशारा किया है। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि वाहनों में फैंसी सीट कवर और एक्सेसरीज़ सुरक्षा उपकरणों की जगह ले लेते हैं, जिससे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार को खतरा पैदा होता है।
संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। जब बाज़ार में बिकने वाले घटिया या अवैज्ञानिक आफ्टरमार्केट एक्सेसरीज़ के कारण दुर्घटना के समय सीट बेल्ट या एयरबैग काम नहीं करते हैं, तो यह सीधे तौर पर नागरिकों के जीवन के अधिकार का हनन है। इसके अलावा, भारत में ‘बाल सुरक्षा’ (Child Safety) नियमों की घोर उपेक्षा की जाती है। छोटे बच्चों को चाइल्ड सीट (CRS) में बैठाने के बजाय अक्सर माता-पिता उन्हें अपनी गोद में लेकर आगे की सीट पर बैठते हैं, जो दुर्घटना के समय बच्चों के लिए बेहद जानलेवा साबित होता है।
सुप्रीम कोर्ट के इस ताज़ा हस्तक्षेप के बाद, अब सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) पर यह भारी दबाव है कि वह मोटर वाहन अधिनियम के तहत मौजूद नियमों को सख्ती से लागू करे। पुलिस और परिवहन विभाग को अब केवल चालान काटने तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि आफ्टरमार्केट कार एक्सेसरीज़ बाज़ार पर भी कड़ी निगरानी रखनी होगी ताकि वे ऐसे उत्पाद न बेचें जो सुरक्षा से समझौता करते हों। यह न्यायिक आदेश सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है, बशर्ते राज्य सरकारें इसे पूरी इच्छाशक्ति के साथ ज़मीन पर उतारें।