भारत-चीन संबंधों में ‘स्थिर प्रगति’: नई दिल्ली में ब्रिक्स के इतर पीएम मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ऐतिहासिक मुलाकात

सीमावर्ती क्षेत्रों में ‘शांति और स्थिरता’ द्विपक्षीय विकास के लिए आवश्यक: पीएम मोदी; शी ने दोनों देशों को बताया ‘ग्लोबल साउथ’ का प्रमुख स्तंभ
विवेक ओझा
नई दिल्ली
एशिया की दो सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक महाशक्तियों, भारत और चीन के बीच वर्षों से जमे हुए कूटनीतिक बर्फ में अब स्पष्ट रूप से पिघलाव देखा जा रहा है। 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के बाद से दोनों देशों के बीच संबंधों में जो एक लंबी और चिंताजनक खटास पैदा हो गई थी, वह अब संवाद और आपसी समझ की ओर लौटती हुई प्रतीत हो रही है। नई दिल्ली में चल रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान एक बहुप्रतीक्षित और अत्यंत महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता सामने आई है। कल्लोल भट्टाचार्जी की रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत-चीन संबंधों में हो रही ‘स्थिर प्रगति’ (steady progress) का गर्मजोशी से स्वागत किया है।
यह ऐतिहासिक घटनाक्रम 12 सितंबर, 2026 को उस समय देखने को मिला, जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के मौके पर (on the sidelines) चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ एक विशेष द्विपक्षीय बैठक की और उनसे हाथ मिलाया। दोनों देशों के शीर्ष नेताओं का इस तरह मुस्कुराते हुए हाथ मिलाना केवल एक तस्वीर नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया और विशेष रूप से पश्चिमी देशों के लिए एक बहुत बड़ा भू-राजनीतिक संदेश है। यह दर्शाता है कि मतभेदों के बावजूद, भारत और चीन अपने विवादों को द्विपक्षीय स्तर पर सुलझाने और वैश्विक मंचों पर एक साथ खड़े होने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं।
इस उच्च स्तरीय और गहन द्विपक्षीय वार्ता के दौरान, भारत ने सीमा विवाद को लेकर अपना पुराना और अडिग रुख एक बार फिर बहुत ही स्पष्ट शब्दों में सामने रखा। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने चीनी नेतृत्व को स्पष्ट रूप से बताया कि द्विपक्षीय संबंधों के सुचारू विकास के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों में “शांति और स्थिरता” (Peace and tranquillity) का होना सबसे आवश्यक शर्त है। भारत का यह बयान इस बात की पुष्टि करता है कि जब तक वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर स्थिति पूरी तरह से सामान्य नहीं हो जाती और सैनिकों की पूर्ण वापसी नहीं होती, तब तक दोनों देशों के बीच व्यापार और अन्य सामान्य कूटनीतिक रिश्ते अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच सकते।
वहीं दूसरी ओर, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस वार्ता के दौरान एक व्यापक और वैश्विक दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास किया। श्री शी ने भारत और चीन की वैश्विक अहमियत को रेखांकित करते हुए दोनों देशों को “महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियों” (significant responsibilities) वाले प्रमुख ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) देशों के रूप में वर्णित किया। चीन यह भली-भांति जानता है कि यदि उसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिकी और पश्चिमी दबदबे को प्रभावी ढंग से चुनौती देनी है, तो उसे भारत जैसे मज़बूत और प्रभावशाली पड़ोसी का साथ चाहिए। ‘ग्लोबल साउथ’ के नेता के रूप में भारत की बढ़ती छवि को चीन भी अब गंभीरता से ले रहा है। यह बैठक इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि भारत और चीन अब अपने सीमा विवादों को एक रणनीतिक परिपक्वता के साथ संभाल रहे हैं और भविष्य में एक स्थिर और सहयोगात्मक संबंध बनाने की दिशा में धीमी लेकिन ठोस प्रगति कर रहे हैं।