‘पश्चिम बंगाल न होता तो हमारा हश्र बांग्लादेश के चिन्मय दास जैसा होता’: सीएम शुभेंदु अधिकारी का बड़ा बयान

वाममोर्चा और टीएमसी पर बंगाली हिंदुओं की सांस्कृतिक परंपराओं को नष्ट करने का लगाया कड़ा आरोप
राघवेन्द्र प्रताप सिंह/ कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अस्मिता का मुद्दा हमेशा से एक बेहद संवेदनशील और निर्णायक कारक रहा है। पड़ोसी देश बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हो रहे कथित उत्पीड़न और वहां की ताज़ा राजनीतिक उथल-पुथल की पृष्ठभूमि में, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ने एक बहुत ही तीखा और ध्रुवीकरण करने वाला बयान दिया है। 12 सितंबर 2026 को सामने आई एक रिपोर्ट के अनुसार, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा है कि अगर पश्चिम बंगाल का निर्माण नहीं हुआ होता, तो उन्हें भी बांग्लादेश के चिन्मय दास जैसे भाग्य का सामना करना पड़ता। यह बयान स्पष्ट रूप से विभाजन की ऐतिहासिक विभीषिका और वर्तमान में हिंदुओं की सुरक्षा चिंताओं को एक साथ जोड़कर देखा जा रहा है।
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का यह आक्रामक राजनीतिक रुख सीधे तौर पर राज्य के पुराने शासकों के खिलाफ है। अपने इस महत्वपूर्ण और वैचारिक भाषण के दौरान, मुख्यमंत्री ने राज्य के पूर्व राजनीतिक आकाओं—वाम मोर्चा (Left Front) और तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress)—दोनों की सरकारों पर तीखा निशाना साधा। उनका आरोप है कि इन दोनों ही राजनीतिक दलों ने अपने-अपने लंबे कार्यकालों के दौरान अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नीति अपनाई, जिसके कारण बहुसंख्यक समाज को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और धार्मिक स्वतंत्रताओं से दूर होना पड़ा।
अपने इस कड़े प्रहार को आगे बढ़ाते हुए, मुख्यमंत्री ने वामपंथियों और तृणमूल कांग्रेस पर राज्य में बंगाली हिंदुओं की सांस्कृतिक परंपराओं को नष्ट करने का बहुत ही गंभीर आरोप लगाया। बंगाल, जो कभी भारतीय पुनर्जागरण, साहित्य और आध्यात्मिक चेतना का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता था, उसे लेकर उनका मानना है कि पिछली सरकारों ने जानबूझकर हिंदू त्योहारों, अनुष्ठानों और शिक्षा प्रणाली को राजनीतिक लाभ के लिए कमज़ोर किया। यह बयान एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश देता है कि उनकी नई सरकार अब उस कथित नुकसान की पूरी तरह से भरपाई करने के लिए तैयार है।
इस चिंताजनक तस्वीर को पेश करने के साथ ही, मुख्यमंत्री ने राज्य की बहुसंख्यक आबादी को एक बड़ा आश्वासन भी दिया। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने जनता से वादा किया है कि वह पश्चिम बंगाल में धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को फिर से बहाल करेंगे। उनका यह वादा उस ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के एजेंडे का हिस्सा है, जिसके तहत ऐतिहासिक मंदिरों का जीर्णोद्धार, बंगाली हिंदू प्रतीकों का सम्मान और धार्मिक उत्सवों को बिना किसी राजनीतिक बाधा के आयोजित करना शामिल है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे कथित अत्याचारों का हवाला देकर, मुख्यमंत्री राज्य के मतदाताओं को यह याद दिलाना चाहते हैं कि उनकी सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान के लिए उनकी सरकार का होना कितनी आवश्यक शर्त है। यह बयान न केवल राज्य की वर्तमान राजनीतिक स्थिति को गरमाएगा, बल्कि यह वामदलों और टीएमसी को भी एक कड़े वैचारिक बचाव की मुद्रा में ला खड़ा करेगा। बंगाल में धर्म और संस्कृति हमेशा से जनमानस के बहुत करीब रहे हैं, और इस नए राजनीतिक आख्यान से यह स्पष्ट है कि आगामी चुनावों में यह एक बहुत बड़ा और निर्णायक मुद्दा बनने जा रहा है।