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पश्चिमी घाट की जैव विविधता में एक नया अध्याय: महाराष्ट्र से खोजा गया ‘पैर रहित’ उभयचर

विवेक ओझा/ कोल्हापुर / मुंबई: भारतीय उपमहाद्वीप और विशेष रूप से पश्चिमी घाट (Western Ghats) की भौगोलिक संरचना दुनिया के सबसे समृद्ध और विविध पारिस्थितिक तंत्रों में से एक है। यहां की घनी वनस्पतियों और नम मिट्टी के भीतर अभी भी अनगिनत ऐसे रहस्य और जीव-जंतु छिपे हुए हैं, जिन्हें आधुनिक विज्ञान ने अब तक पूरी तरह से नहीं जाना है। इस दिशा में कार्य कर रहे वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के लिए एक अत्यंत उत्साहजनक और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। महाराष्ट्र राज्य के भीतर एक बिल्कुल ही नए और अनोखे जीव की खोज की गई है। शिव सहाय सिंह (SHIV SAHAY SINGH) द्वारा 12 सितंबर 2026 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र से पैर रहित उभयचर (legless amphibian) की एक नई प्रजाति की खोज की गई है।

यह खोज कोई अचानक हुई घटना नहीं है, बल्कि यह देश के कई प्रमुख वैज्ञानिक संस्थानों के शोधकर्ताओं के लंबे और कठिन ज़मीनी काम का शानदार परिणाम है। इस महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोज को एक बहु-संस्थागत शोधकर्ताओं की टीम (multi-institutional team of researchers) द्वारा सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया है। शोधकर्ताओं की इस समर्पित टीम ने उत्तरी पश्चिमी घाट के कोल्हापुर क्षेत्र (चंदगढ़) के घने और नम जंगलों में इस दुर्लभ जीव को ढूंढ निकाला। कोल्हापुर का यह चंदगढ़ (Chandgad) क्षेत्र अपनी विशिष्ट जलवायु और मिट्टी की अनूठी संरचना के लिए जाना जाता है, जो ऐसे पैर रहित उभयचरों के छिपने और पनपने के लिए एक आदर्श प्राकृतिक आवास प्रदान करता है।

शोधकर्ताओं ने इस नई प्रजाति की विस्तृत रूपात्मक (morphological) और आनुवंशिक (genetic) जांच करने के बाद इसे विज्ञान की दुनिया में एक बिल्कुल नया नाम दिया है। इस नई खोजी गई प्रजाति का नाम ‘गेगेनियोफिस चंदगाड़ी’ (Gegeneophis chandgadi) रखा गया है। इसका यह नाम उस विशिष्ट भौगोलिक स्थान (चंदगढ़) के सम्मान में रखा गया है जहां से इसे पहली बार खोजा और पहचाना गया है।

यह जीव दिखने में भले ही एक केंचुए या छोटे सांप जैसा प्रतीत होता हो, लेकिन यह वास्तव में मेंढकों और सैलामैंडर की तरह एक उभयचर (Amphibian) है। इन जीवों को कैसिलियन (Caecilian) कहा जाता है। ये जीव अपना अधिकांश जीवन मिट्टी के नीचे गहरे अंधेरे में बिताते हैं, जिसके कारण इनकी आंखें अक्सर त्वचा के नीचे छिपी होती हैं और इनके पैर नहीं होते। ये जीव मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने, उसमें हवा का प्रवाह करने और कीड़े-मकोड़ों की आबादी को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करने में एक बहुत ही महत्वपूर्ण पारिस्थितिक भूमिका निभाते हैं।

महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट क्षेत्र से ऐसी एक नई प्रजाति का मिलना इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि हमें अपने प्राकृतिक आवासों और घने जंगलों के संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। बढ़ता बेतहाशा शहरीकरण, जंगलों की कटाई और जलवायु परिवर्तन ऐसे दुर्लभ जीवों के अस्तित्व के लिए एक सीधा खतरा बन गए हैं। ‘गेगेनियोफिस चंदगाड़ी’ की यह वैज्ञानिक खोज न केवल भारत के प्राणी विज्ञान सर्वेक्षण के लिए गर्व का क्षण है, बल्कि यह एक कड़ी चेतावनी भी है कि इस अद्वितीय जैव-हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspot) को इंसानी दखल से हर हाल में बचाकर रखना हमारी पहली ज़िम्मेदारी है।