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लद्दाख में गहराया राजनीतिक विवाद: पूर्व भाजपा सांसद थुपस्तान छवांग ने सोनम वांगचुक और अन्य नेताओं पर लगाया जनता को गुमराह करने का आरोप

9 सितंबर की बैठक को बताया ‘फलदायी’, नागरिक समाज के आपसी मतभेदों को ठहराया अधिकारों में देरी का ज़िम्मेदार

सरिता त्रिपाठी
लेह / नई दिल्ली

भारत के रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण और नवगठित केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों को लेकर चल रहा संघर्ष अब एक गहरे आंतरिक टकराव और आरोप-प्रत्यारोप के दौर में प्रवेश कर गया है। छठी अनुसूची लागू करने, पूर्ण राज्य का दर्जा देने और स्थानीय रोज़गार की सुरक्षा की मांग को लेकर लद्दाख का नागरिक समाज लंबे समय से आंदोलनरत है। हालांकि, इस आंदोलन के नेताओं के बीच अब भारी वैचारिक मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। विजइता सिंह की रिपोर्ट के अनुसार, लद्दाख के पूर्व भाजपा सांसद (Former BJP MP) ने मशहूर जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और अन्य स्थानीय नेताओं पर केंद्र शासित प्रदेश (UT) की जनता को जानबूझकर गुमराह करने का बेहद गंभीर आरोप लगाया है।

यह पूरा राजनीतिक विवाद हाल ही में नई दिल्ली में हुई एक अत्यंत महत्वपूर्ण त्रिपक्षीय वार्ता के निष्कर्षों को लेकर शुरू हुआ है। लद्दाख के पूर्व सांसद श्री थुपस्तान छवांग (Thupstan Chhewang) ने अपना कड़ा रुख स्पष्ट करते हुए इस बात पर ज़ोर दिया (insists) है कि 9 सितंबर को लद्दाख के नागरिक समाज, केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) और केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन के बीच हुई बैठक पूरी तरह से “फलदायी” (fruitful) रही थी। उनका यह बयान उन तमाम अटकलों और नकारात्मक खबरों पर विराम लगाने का एक प्रयास है जो इस बैठक के तुरंत बाद फैलाई गई थीं। एक पूर्व जन-प्रतिनिधि के रूप में उनका यह मानना है कि केंद्र सरकार लद्दाख के लोगों की मांगों के प्रति संवेदनशील है और बातचीत एक सही और सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है।

हालांकि, लद्दाख के आंदोलन का नेतृत्व कर रहे मुख्य संगठनों का नज़रिया इस बैठक को लेकर बिल्कुल इसके विपरीत है। लद्दाख के दो सबसे प्रमुख और शक्तिशाली संगठनों—लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और करगिल डेमोक्रेटिक एलायंस (KDA)—ने इस वार्ता के तुरंत बाद कड़ा असंतोष व्यक्त किया था। LAB और KDA का दावा है कि गृह मंत्रालय के साथ हुई यह बैठक एक घोर “निराशा” (disappointment) थी। इन संगठनों का आरोप है कि केंद्र सरकार उन्हें केवल समितियों और वार्ताओं के जाल में उलझा रही है, और उनकी मुख्य मांगों (पूर्ण राज्य और छठी अनुसूची) पर कोई भी ठोस या संवैधानिक आश्वासन देने से लगातार बच रही है।

इस विरोधाभास के बीच, पूर्व भाजपा सांसद थुपस्तान छवांग ने आंदोलनकारी नेताओं को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। पूर्व सांसद का स्पष्ट रूप से कहना है कि लद्दाख को उसके अधिकार मिलने में जो भी देरी हो रही है, उसका मुख्य कारण नागरिक समाज के भीतर चल रहे आपसी मतभेद (civil society differences) हैं, न कि गृह मंत्रालय (not MHA)। उनका यह बयान लेह और करगिल के नेताओं के बीच, और यहां तक कि सोनम वांगचुक जैसे कार्यकर्ताओं और स्थापित राजनेताओं के बीच चल रही राजनीतिक रस्साकशी को बेनकाब करता है।

यह स्थिति लद्दाख के आम नागरिकों के लिए एक बड़ी दुविधा पैदा कर रही है, जो अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए कड़ाके की ठंड में सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं। 9 सितंबर को लद्दाखी नागरिक समाज के बीच हुई वार्ता (September 9 talks between Ladakhi civil society) के बाद उत्पन्न हुए इस भारी गतिरोध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब तक लद्दाख के सभी राजनीतिक और सामाजिक संगठन अपने आपसी मतभेदों को भुलाकर एक ही मंच पर एक ही स्वर में बात नहीं करेंगे, तब तक केंद्र सरकार के साथ किसी भी अंतिम और स्थायी समझौते पर पहुंचना बेहद मुश्किल होगा।