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न्यायपालिका आलोचना के खिलाफ नहीं, लेकिन ‘अज्ञानतापूर्ण दावों’ पर ऐतराज़: एनसीईआरटी मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

8वीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की किताब से हटाया गया न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़ा विवादित अध्याय

विवेक ओझा
नई दिल्ली

भारत की स्कूली शिक्षा प्रणाली और पाठ्यक्रम अक्सर वैचारिक और तथ्यात्मक बहसों का केंद्र रहे हैं। स्कूली किताबों में देश की न्यायपालिका को किस प्रकार चित्रित किया जाना चाहिए, इसे लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया था। इस मामले की सुनवाई करते हुए भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ी टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने स्पष्ट किया है कि न्यायपालिका आलोचना के खिलाफ नहीं है, लेकिन उसे ‘अज्ञानतापूर्ण दावों’ (uninformed assertion) पर कड़ा ऐतराज़ है। यह टिप्पणी उस संतुलन को दर्शाती है जो एक स्वस्थ लोकतंत्र में संस्थानों के सम्मान और रचनात्मक आलोचना के बीच होना चाहिए।

यह पूरा कानूनी और शैक्षिक विवाद राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) द्वारा प्रकाशित एक पाठ्यपुस्तक से जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच (Supreme Court Bench) एनसीईआरटी की 8वीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की किताब से संबंधित एक स्वतः संज्ञान मामले (suo motu case) की सुनवाई कर रही थी। इस किताब में एक अध्याय ऐसा था जिसने कानूनी बिरादरी और न्यायाधीशों के बीच भारी नाराज़गी पैदा कर दी थी। पुस्तक में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ (‘corruption in the judiciary’) को लेकर कुछ ‘आपत्तिजनक’ सामग्री शामिल थी।

न्यायपालिका का मानना है कि छोटे बच्चों के कोमल मस्तिष्क में देश की सर्वोच्च न्याय प्रणाली के प्रति अविश्वास या बिना साक्ष्यों के भ्रष्टाचार की धारणा पैदा करना समाज के लिए घातक हो सकता है। रचनात्मक आलोचना और न्याय प्रणाली के दोषों का अध्ययन उच्च स्तर पर तो स्वीकार्य हो सकता है, लेकिन कक्षा 8 के छात्रों के लिए बिना उचित संदर्भ और प्रमाण के ऐसे ‘अज्ञानतापूर्ण दावों’ को पढ़ाना अनुचित है।

हालांकि, इस मामले में केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्रालय ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए पहले ही सुधारात्मक कदम उठा लिए थे। सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिया कि विवादित अध्याय को अब हटाकर बदल दिया गया है। अदालत को सूचित किया गया कि यह बदलाव केंद्र द्वारा गठित एक विशेषज्ञ पैनल द्वारा सुझाए गए संशोधनों के आधार पर किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई पर संतोष व्यक्त किया। इस मामले ने एक बार फिर एनसीईआरटी की पाठ्य पुस्तक निर्माण प्रक्रिया की समीक्षा प्रणाली पर प्रकाश डाला है। शिक्षाविदों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि पाठ्यक्रम तैयार करने वाली समितियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि छात्रों को देश के लोकतांत्रिक स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—के बारे में संतुलित, वस्तुनिष्ठ और साक्ष्य-आधारित जानकारी ही प्रदान की जाए। किसी भी संस्था की कमियों को उचित मंच पर एक निष्पक्ष और तर्कसंगत तरीके से संबोधित किया जाना चाहिए। यह निर्णय भविष्य में स्कूली पाठ्य पुस्तकों में संवेदनशील विषयों के समावेश के लिए एक महत्वपूर्ण दिशानिर्देश के रूप में कार्य करेगा।