प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 76वां जन्मदिन: वडनगर की गलियों से देश की सत्ता के शीर्ष तक, जानिए कैसा रहा ऐतिहासिक राजनीतिक सफर

आज देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपना 76वां जन्मदिन मना रहे हैं। इस खास अवसर पर उनके जीवन और राजनीतिक सफर का एक बहुत बड़ा पड़ाव भी जुड़ गया है। ठीक 25 साल पहले, यानी 7 अक्टूबर 2001 को उन्होंने पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी और आज 2026 में वह देश की सत्ता के शीर्ष पर अपने सफल 25 साल पूरे कर रहे हैं। इस ऐतिहासिक मील के पत्थर को सेलिब्रेट करने के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) की तरफ से देशभर में 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक ‘सेवा संकल्प अभियान’ का आगाज किया गया है, जिसके तहत कई जनहित और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। आइए जानते हैं वडनगर के एक साधारण चाय की दुकान से लेकर देश के प्रधानमंत्री बनने तक का उनका यह सफर कैसा रहा।वडनगर की गलियों और चाय की दुकान से शुरुआतनरेंद्र मोदी का जन्म 17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में माता हीराबेन और पिता दामोदरदास मोदी के घर हुआ था। साल 1955 में उन्होंने वडनगर की प्राथमिक कुमार शाला से अपनी शुरुआती पढ़ाई शुरू की। इसके बाद, साल 1957 के आसपास स्कूल के बाद वह अपने पिता की चाय की दुकान पर हाथ बंटाने लगे। बचपन से ही उनके भीतर देशप्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी थी। साल 1962 में भारत-चीन युद्ध ने उनके कोमल मन पर गहरा असर छोड़ा, जिसके चलते उन्होंने जामनगर के सैनिक स्कूल बालाचड़ी में एडमिशन के लिए आवेदन भी किया था, हालांकि किन्हीं कारणों से वहां दाखिला नहीं मिल पाया। कहा जाता है कि महज 12 साल की उम्र में उन्होंने गांधीवादी नेताओं के साथ मिलकर गोरक्षा को लेकर अपना पहला उपवास भी रखा था। आगे चलकर 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान वह मेहसाणा रेलवे स्टेशन पर सीमा की ओर आने-जाने वाले वीर सैनिकों को चाय पिलाया करते थे।17 साल की उम्र में छोड़ा घर और आध्यात्मिक यात्रासाल 1967 में बीएन हाई स्कूल, वडनगर से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद करीब 17 साल की युवा अवस्था में उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान की तलाश में अपना घर छोड़ दिया। इस दौरान उनकी मुलाकात प्रख्यात विचारक एकनाथ रानाडे से हुई और वह विवेकानंद रॉक मेमोरियल के लिए चंदा जुटाने वाले अभियान से जुड़ गए, जिसमें लोगों से एक-एक रुपये का सहयोग लिया जाता था। इसके बाद उनका यह सफर बेलूर मठ से होते हुए सिलीगुड़ी, गुवाहाटी और अल्मोड़ा के अद्वैत आश्रम तक जा पहुंचा। गरुड़ छट्टी की गुफाओं में कड़ाके की ठंड के बीच उन्होंने लंबा ध्यान किया और एक भयंकर तूफान के दौरान राहत एवं बचाव कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाई। देश के अलग-अलग राज्यों की लंबी यात्रा करने के बाद वह राजकोट के रामकृष्ण मिशन पहुंचे, जहां स्वामी आत्मस्थानंद ने उन्हें संन्यास लेकर दुनिया से कट जाने के बजाय जनसेवा के मार्ग पर चलने की अमूल्य सलाह दी।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ाव और आपातकाल का दौरलगभग 18 महीने लंबी आध्यात्मिक यात्रा के बाद साल 1970 में वह अपने गृह नगर वडनगर लौटे और फिर अहमदाबाद आ गए। यहां उन्होंने गीतामंदिर बस स्टैंड के पास अपने चाचा की चाय की दुकान पर काम किया। संयोगवश, इसके पास ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का डॉ. हेडगेवार भवन था, जहां उनकी मुलाकात पुराने परिचितों और संघ के कार्यकर्ताओं से दोबारा हुई और वह पूरी तरह से संगठन के कार्यों में रम गए।साल 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान वह दिल्ली पहुंचे और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में हुए ‘गण सत्याग्रह’ में शामिल होकर गिरफ्तारी दी, जिसके बाद उन्हें कुछ समय के लिए तिहाड़ जेल में भी रहना पड़ा। साल 1974 के नवनिर्माण आंदोलन और 1975 में देश में लगे आपातकाल के दौरान उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए भूमिगत रहकर कड़ा संघर्ष किया और गुजरात लोक संघर्ष समिति से जुड़े रहे। धीरे-धीरे संगठन में उनकी कार्यकुशलता को देखते हुए उन्हें 1978 में विभाग प्रचारक और 1980 में संभाग प्रचारक की जिम्मेदारी सौंपी गई।भारतीय जनता पार्टी में एंट्री और गुजरात से राष्ट्रीय राजनीति का सफरसाल 1987 में नरेंद्र मोदी ने औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थामा और गुजरात संगठन में संगठन सचिव का कार्यभार संभाला। उनके नेतृत्व और संगठनात्मक कौशल का ही परिणाम था कि अहमदाबाद नगर निगम चुनावों में भाजपा को पहली बार ऐतिहासिक जीत हासिल हुई। इसके बाद 1990 के विधानसभा चुनावों में पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया।संगठन के भीतर उनकी बढ़ती जिम्मेदारियों के बीच साल 1998 में उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) नियुक्त किया गया, जिससे उनका कार्यक्षेत्र गुजरात से बढ़कर पूरे देश में फैल गया। पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई।7 अक्टूबर 2001: गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में ऐतिहासिक शपथसंगठन में करीब तीन दशकों तक निष्काम भाव से अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाने के बाद, 7 अक्टूबर 2001 का दिन उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। इस दिन उन्होंने पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। उस समय पूरा राज्य जनवरी 2001 के विनाशकारी भुज भूकंप के भयानक जख्मों और पुनर्वास की भारी चुनौतियों से जूझ रहा था। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने गुजरात राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (GSDMA) के माध्यम से एक बेहद सफल मालिक-आधारित पुनर्वास मॉडल लागू किया। उनके इस बेहतरीन प्रशासनिक अनुभव और दूरदर्शी सोच को बाद में साल 2005 के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम में भी शामिल किया गया, जिसने आगे चलकर देश की राजनीति की दिशा ही बदल दी।