भारत पर भड़केगा अमेरिका? 100% टैरिफ वाला ‘खतरनाक’ बिल अमेरिकी संसद में पास, रूसी तेल खरीदने पर अब गिरेगी गाज!

विवेक ओझा
वाशिंगटन/नई दिल्ली: रूस के साथ भारत की दोस्ती और सस्ते तेल की खरीददारी अब अमेरिका की आंखों में बुरी तरह चुभने लगी है। अमेरिकी संसद (US Congress) ने एक ऐसा बेहद आक्रामक और बड़ा प्रतिबंध (Sanctions) विधेयक पारित कर दिया है, जिसका सीधा और भयानक असर भारत और चीन जैसे देशों पर पड़ने वाला है। इस नए बिल के तहत अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह विशेषाधिकार मिल गया है कि वे रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों के खिलाफ उनके उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक का भारी-भरकम ‘टैरिफ’ (Tariff) यानी आयात शुल्क लगा सकें!
क्या है यह नया ‘रूसी प्रतिबंध बिल’ और क्यों निशाने पर है भारत?
यह पूरा मामला रूस-यूक्रेन युद्ध और उससे जुड़ी अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। अमेरिका का मानना है कि रूसी तेल की भारी खरीद से मॉस्को को युद्ध लड़ने के लिए पैसा मिल रहा है। इस बिल की इनसाइड स्टोरी:
- ‘टॉप 5’ खरीददारों पर सीधा वार: इस बिल का मुख्य लक्ष्य उन 5 सबसे बड़े देशों को सजा देना है, जो रूस से सबसे ज्यादा कच्चा तेल (Crude Oil) और गैस खरीदते हैं। चूंकि भारत और चीन इस लिस्ट में सबसे ऊपर हैं, इसलिए अमेरिकी निशाने पर सीधे यही दोनों देश हैं।
- 100% टैरिफ का खौफनाक हथियार: इस बिल के कानून बनने के बाद, अमेरिकी राष्ट्रपति के पास यह पावर आ जाएगी कि वह भारत से अमेरिका जाने वाले सामानों (Exports) पर 100% तक की कस्टम ड्यूटी लगा सकें। अगर ऐसा हुआ तो अमेरिका में भारतीय सामान दोगुने महंगे हो जाएंगे और भारत के निर्यात बाजार को बड़ा झटका लगेगा।
- ‘शैडो फ्लीट’ पर भी नकेल: बिल में रूसी तेल को चोरी-छिपे ले जाने वाले जहाजों (Shadow Fleet) और रूसी नेतृत्व व उनके शीर्ष अधिकारियों पर भी कड़े प्रतिबंधों का प्रावधान है।
क्या सच में ट्रंप उठाएंगे यह ‘बर्बाद’ करने वाला कदम?
अमेरिकी सीनेट (Senate) के बाद अब प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) ने भी इस बिल को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है। अब यह सिर्फ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर के लिए उनकी टेबल पर है। ट्रंप को हमेशा से ही ‘टैरिफ मैन’ कहा जाता है, लेकिन कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि भारत अमेरिका का एक अहम रणनीतिक साझेदार है। इसलिए यह बिल भारत पर 100% टैरिफ लगाने से ज्यादा, उस पर कूटनीतिक दबाव बनाने का एक बड़ा ‘हथियार’ माना जा रहा है।
अमेरिकी संसद द्वारा पास किया गया यह बिल भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक बड़ा ‘अलर्ट’ है। अब गेंद पूरी तरह से वाशिंगटन और नई दिल्ली के कूटनीतिक पाले में है। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या भारत अमेरिकी दबाव के आगे झुकते हुए रूसी तेल से किनारा करेगा, या फिर अपनी ऊर्जा जरूरतों को सर्वोपरि रखते हुए इस ‘टैरिफ युद्ध’ का सामना करेगा!