न्यायपालिका आलोचना से बचकर जनता का विश्वास नहीं जीत सकती: सीजेआई (CJI)

अभिषेक सिंह
नई दिल्ली
भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में न्यायपालिका का स्थान सबसे अधिक सम्मानजनक और स्वतंत्र माना जाता है। देश के करोड़ों नागरिकों की अंतिम उम्मीद अदालतें ही होती हैं। लेकिन इस सम्मान को बनाए रखने के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही सबसे अहम शर्तें हैं। इसी विषय पर एक बेहद कड़ा, स्पष्ट और ऐतिहासिक रुख अपनाते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश ने एक अहम बयान दिया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने स्पष्ट किया है कि न्यायपालिका स्वयं को जांच या सूक्ष्म परीक्षण (scrutiny) से बचाकर जनता का विश्वास अर्जित नहीं कर सकती है। उनका यह बयान एक ऐसे समय में आया है जब देश के विभिन्न मंचों पर न्यायिक सुधारों, जजों की नियुक्तियों और अदालती कार्यवाहियों की पारदर्शिता को लेकर लगातार गंभीर बहसें चल रही हैं।
सोमवार, 14 सितंबर, 2026 को नई दिल्ली में कानूनी बिरादरी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस अवसर पर भारत के मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति सूर्य कांत ने ‘राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर’ के छठे संस्करण (sixth edition) को संबोधित किया। यह वार्षिक व्याख्यान सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व कानून मंत्री, स्वर्गीय राम जेठमलानी की स्मृति में आयोजित किया जाता है। इस मंच से बोलते हुए सीजेआई ने न्याय प्रणाली की जवाबदेही पर जो विचार प्रस्तुत किए, वे आने वाले लंबे समय तक कानूनी विमर्श का केंद्र बने रहेंगे।
अपने संबोधन के दौरान, मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि “कोई भी अदालत खुद को जांच के दायरे से बाहर रखकर जनता का विश्वास नहीं मांग सकती”। यह टिप्पणी उस आम धारणा को तोड़ती है कि न्यायपालिका की आलोचना नहीं की जा सकती या उसके फैसले हमेशा जांच से परे होते हैं। सीजेआई ने इस बात पर जोर दिया कि एक जीवंत लोकतंत्र में हर संस्थान को जनता के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए।
उन्होंने अपनी बात को और अधिक मुखर करते हुए आगे कहा कि अदालत को “परीक्षण किए जाने, सवाल पूछे जाने और जहां आवश्यक हो, आलोचना किए जाने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए”। यह बयान इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि देश की सर्वोच्च अदालत स्वस्थ और रचनात्मक आलोचना का स्वागत करती है। जब न्यायपालिका के फैसलों और प्रक्रियाओं पर जनता, मीडिया या शिक्षाविदों द्वारा सवाल उठाए जाते हैं, तो इससे व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश बनती है।
हाल के वर्षों में सोशल मीडिया के उभार के साथ ही जजों और उनके फैसलों की त्वरित आलोचना एक आम बात हो गई है। ऐसे में सीजेआई का यह परिपक्व बयान दर्शाता है कि न्यायपालिका इस नए युग की चुनौतियों को समझ रही है और वह एक ‘बंद कमरे’ की व्यवस्था के बजाय एक खुली और पारदर्शी व्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर है। राम जेठमलानी जैसे बेबाक वकील की याद में आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्य न्यायाधीश के ये शब्द वास्तव में भारतीय न्याय प्रणाली के लिए एक सशक्त और पारदर्शी भविष्य का मार्ग प्रशस्त करते हैं।