परीक्षा की लड़ाई जीतने के बाद अब ‘नौकरियों के युद्ध’ का सामना कर रहे भारतीय युवा

द इंडियन व्यू टीम
मुंबई / नई दिल्ली
भारत दुनिया का सबसे युवा देश होने का गौरव रखता है, और ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ (जनसांख्यिकीय लाभांश) को अक्सर देश की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत माना जाता है। लेकिन ज़मीनी हकीकत इन बड़े दावों से काफी अलग और डरावनी है। लाखों युवा हर साल विश्वविद्यालयों से डिग्रियां और प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रमाणपत्र हासिल करके बाहर तो निकल रहे हैं, लेकिन उनके सामने रोज़गार का एक बहुत बड़ा संकट खड़ा है। 15 सितंबर 2026 को चोको वल्लियप्पा (Chocko Valliappa) द्वारा प्रकाशित एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट ने इस कड़वी सच्चाई को प्रमुखता से उजागर किया है। रिपोर्ट के अनुसार, कड़ी मेहनत के बाद परीक्षा की लड़ाई जीतने के बावजूद, युवाओं को अब वास्तविक दुनिया में नौकरियों के एक कठिन युद्ध (jobs war) का सामना करना पड़ रहा है।
इस बढ़ती बेरोज़गारी और कौशल बेमेल (Skill Mismatch) के पीछे का मुख्य कारण भारत की दोषपूर्ण कौशल विकास रणनीतियां हैं। रिपोर्ट इस बात पर ज़ोर देती है कि भारत का वर्तमान कौशल विकास प्रयास मुख्य रूप से आपूर्ति-आधारित (supply-led) है। इसका सीधा अर्थ यह है कि सरकारी और निजी कौशल प्रशिक्षण संस्थान केवल वहां खोले जा रहे हैं या वहां प्रशिक्षण दिया जा रहा है जहां लोगों की भारी आबादी मौजूद है, न कि वहां जहां वास्तव में उद्योगों को उन विशिष्ट कौशलों की आवश्यकता है (not where the jobs are)। इस असंतुलन के कारण लाखों युवा सिलाई, बेसिक कंप्यूटर या अन्य पारंपरिक ट्रेडों में प्रशिक्षित तो हो जाते हैं, लेकिन बाज़ार में उनके लिए कोई मांग नहीं होती।
इस संकट की सबसे हृदयविदारक तस्वीर तब सामने आई जब रोज़गार की तलाश में युवाओं का हुजूम सड़कों पर उमड़ पड़ा। 7 सितंबर, 2026 की एक तस्वीर में दक्षिण मुंबई (South Mumbai) की सड़कों पर एक परेशान करने वाला दृश्य देखा गया। एक भर्ती शिविर (recruitment camp) के बाहर हज़ारों की संख्या में युवा नौकरी के इच्छुक (job aspirants) अपने बायोडाटा (resumes) के साथ लंबी कतारों में खड़े देखे गए। चिलचिलाती धूप और धक्का-मुक्की के बीच चंद नौकरियों के लिए उमड़ी यह हज़ारों की भीड़ देश के ‘जॉब क्राइसिस’ का एक जीता-जागता और खौफनाक सुबूत है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक भारत अपनी शिक्षा और कौशल प्रणालियों को मांग-संचालित (Demand-led) नहीं बनाता, तब तक यह संकट और गहराता जाएगा। आज उद्योग 4.0 (Industry 4.0), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रोबोटिक्स और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग का दौर है, लेकिन हमारे अधिकांश युवाओं को आज भी वही पुराने कौशल सिखाए जा रहे हैं जो अब बाज़ार में प्रासंगिक नहीं रह गए हैं। सरकार को उद्योगों के साथ मिलकर पाठ्यक्रम तैयार करने होंगे और यह सुनिश्चित करना होगा कि युवाओं को केवल डिग्री नहीं, बल्कि ‘इम्प्लॉयबिलिटी’ (रोज़गार क्षमता) मिले। युवाओं को नौकरियों के इस निर्मम युद्ध में खाली हाथ नहीं छोड़ा जा सकता, अन्यथा यह ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ बहुत जल्द एक ‘जनसांख्यिकीय आपदा’ में बदल सकता है।