तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न पर महासंग्राम: निर्वाचन आयोग ने दोनों गुटों के साथ की विस्तृत बैठक

राघवेंद्र प्रताप सिंह
नई दिल्ली
पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए एक बहुत बड़े और अप्रत्याशित भूचाल ने राज्य के सबसे शक्तिशाली और सत्तारूढ़ राजनीतिक दल को दो फाड़ कर दिया है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर राजनीतिक वर्चस्व की यह भयंकर लड़ाई अब सड़कों और स्थानीय पार्टी कार्यालयों से निकलकर देश के सर्वोच्च चुनाव निकाय की चौखट तक पहुंच गई है। मूल पार्टी के नाम और उसके प्रतिष्ठित चुनाव चिह्न पर आधिकारिक दावेदारी को लेकर चल रही इस रस्साकशी में भारत के निर्वाचन आयोग ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम उठाया है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, निर्वाचन आयोग ने तृणमूल के दोनों गुटों के साथ बैठक की है। यह बैठक इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आयोग इस संवेदनशील राजनीतिक विवाद का जल्द से जल्द कोई वैधानिक समाधान निकालना चाहता है।
इस विवाद की गंभीरता और तात्कालिकता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि राज्य में जल्द ही महत्वपूर्ण उपचुनाव होने वाले हैं। बारह सितंबर, दो हज़ार छब्बीस को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, निर्वाचन पैनल ने छह अक्टूबर के विधानसभा उपचुनाव से पूर्व तृणमूल के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी गुटों की दलीलें सुनीं। छह अक्टूबर को होने वाले इस विधानसभा उपचुनाव को दोनों ही गुट अपनी राजनीतिक शक्ति और जनता के बीच अपनी वास्तविक स्वीकार्यता साबित करने के एक बड़े अवसर के रूप में देख रहे हैं। ऐसे में चुनाव चिह्न का आधिकारिक आवंटन यह तय करेगा कि वैधानिक रूप से असली तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व कौन कर रहा है।
निर्वाचन आयोग के मुख्यालय में हुई इस महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान दोनों गुटों के वरिष्ठ अधिवक्ताओं और राजनीतिक प्रतिनिधियों ने अपने-अपने दावे मजबूती से पेश किए। ममता बनर्जी गुट का तर्क है कि वे पार्टी के मूल संस्थापक हैं और पूर्ण बहुमत के साथ-साथ पार्टी के संपूर्ण संगठनात्मक ढांचे पर उनका ही वैधानिक नियंत्रण है। वहीं दूसरी ओर, ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले विद्रोही गुट का दावा है कि पार्टी के मूल सिद्धांतों से भारी समझौता किया गया है और वास्तविक कार्यकर्ता (कैडर) उनके साथ खड़े हैं।
आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के पश्चात एक बड़ा और निर्णायक निर्देश जारी किया है। निर्वाचन आयोग ने ऋतब्रत समूह से और अधिक दस्तावेज़ मांगे हैं। अतिरिक्त दस्तावेजों की यह मांग स्पष्ट करती है कि केवल मौखिक दावों या कुछ असंतुष्ट नेताओं के समर्थन के आधार पर चुनाव चिह्न नहीं सौंपा जा सकता। ऋतब्रत गुट को अब विधायकों, सांसदों, पार्टी पदाधिकारियों और प्राथमिक सदस्यों के शपथ पत्रों के माध्यम से यह सिद्ध करना होगा कि उनके पास पार्टी का वास्तविक और विधायी बहुमत है।
पार्टी के ज़मीनी कार्यकर्ता भी इस ऐतिहासिक विभाजन से बुरी तरह से भ्रमित और परेशान हैं। पीटीआई द्वारा जारी एक चित्र में पार्टी कार्यकर्ताओं को तृणमूल कांग्रेस के झंडे तैयार करते हुए देखा जा सकता है, जो चुनाव चिह्न के महत्व और कार्यकर्ताओं के असमंजस को दर्शाता है। यदि छह अक्टूबर के उपचुनाव से पूर्व निर्वाचन आयोग किसी एक गुट के पक्ष में ठोस निर्णय नहीं ले पाता है, तो प्रबल संभावना है कि वह वर्तमान चुनाव चिह्न को जब्त (फ्रीज) कर दे और दोनों गुटों को उपचुनाव के लिए नए और अलग-अलग चुनाव चिह्न आवंटित कर दे। यह पूरा घटनाक्रम पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा और दशा को हमेशा के लिए बदलने वाला साबित होगा।