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एमडीआर शुल्क का विश्लेषण: निजी बैंकों और विदेशी यूपीआई ऐप को कैसे होगा सबसे अधिक लाभ?

विवेक ओझा
नई दिल्ली

भारतीय रिज़र्व बैंक और राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) द्वारा डिजिटल भुगतान प्रणाली को आर्थिक रूप से पूर्णतः व्यवहार्य बनाने के लिए हाल ही में उठाए गए कदमों ने वित्तीय क्षेत्र में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। विशेष रूप से मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू होने के पश्चात यह जानना अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है कि इस विशाल वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र में उत्पन्न होने वाले राजस्व का प्रवाह किस दिशा में होगा। ‘द हिंदू’ समाचार पत्र ने इस जटिल गणित को समझने के लिए एक विस्तृत विश्लेषणात्मक रिपोर्ट प्रकाशित की है, जो कई चौंकाने वाले और दिलचस्प तथ्य सामने लाती है।

इस विशेष रिपोर्ट के अनुसार, ‘द हिंदू’ ने एनपीसीआई के आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण किया ताकि यह पता लगाया जा सके कि यूपीआई लेन-देन पर एमडीआर शुल्क से कितना पैसा कमाया जा सकता है। यह विश्लेषण न केवल कुल संभावित राजस्व की सटीक गणना करता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि इस पूरी प्रक्रिया में सबसे अधिक लाभ किसे होने वाला है। आंकड़ों के ग्राफिक प्रस्तुतीकरण और बाज़ार हिस्सेदारी के अध्ययन से यह बिल्कुल स्पष्ट हो गया है कि इस नई व्यवस्था का सबसे बड़ा व्यावसायिक लाभ निजी क्षेत्र के बड़े बैंकों और भारत में काम कर रहे विदेशी यूपीआई एप्लिकेशन को मिलने वाला है।

भारत में यूपीआई भुगतान बाज़ार में वर्तमान में कुछ चुनिंदा विदेशी तकनीकी दिग्गजों और निजी बैंकिंग संस्थाओं का एकाधिकार है। जब करोड़ों उपयोगकर्ता इन ऐप के माध्यम से बड़े व्यापारियों को दो हज़ार रुपये से अधिक का भुगतान करेंगे, तो उससे उत्पन्न होने वाले एमडीआर शुल्क का एक बहुत बड़ा हिस्सा कमीशन के रूप में इन विदेशी ऐप और मध्यस्थ निजी बैंकों के खातों में जाएगा। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की तुलना में, तकनीकी रूप से उन्नत निजी बैंकों ने यूपीआई पारिस्थितिकी तंत्र में बहुत पहले ही अपनी गहरी पैठ बना ली थी, जिसका सीधा आर्थिक लाभ अब उन्हें इस एमडीआर के रूप में मिलने जा रहा है।

इस विश्लेषणात्मक रिपोर्ट में विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों के लिए निर्धारित किए गए अलग-अलग एमडीआर स्लैब की भी विस्तार से जानकारी दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, आवश्यक और कम लाभ-मार्जिन वाले क्षेत्रों में दो हज़ार रुपये या उससे अधिक के लेन-देन पर प्रति लेन-देन पांच रुपये का एक फ्लैट (निश्चित) एमडीआर शुल्क लगेगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि इन विशिष्ट क्षेत्रों में लेन-देन की राशि चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, एमडीआर शुल्क पांच रुपये की सीमा से अधिक नहीं होगा।

इन विशेष रूप से रियायती और जन-आवश्यकता वाले क्षेत्रों की सूची में रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन, और कृषि इनपुट (जैसे बीज और उर्वरक) जैसी बुनियादी सेवाएं शामिल हैं। सरकार और एनपीसीआई का यह कदम यह सुनिश्चित करने के लिए है कि रेलवे टिकट बुक करते समय, पेट्रोल पंपों पर ईंधन भरवाते समय या किसानों द्वारा खाद खरीदते समय उन पर या संबंधित व्यापारियों पर एमडीआर का कोई भारी आर्थिक बोझ न पड़े। यह विश्लेषण स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि डिजिटल भुगतान को असीमित समय तक पूरी तरह से मुफ्त रखना संभव नहीं था, लेकिन एमडीआर के ढांचे को इस प्रकार से तैयार किया गया है कि आम आदमी की बुनियादी और दैनिक आवश्यकताएं इससे न्यूनतम रूप से प्रभावित हों।