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राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) को लगा बड़ा झटका: आतंकवाद के गंभीर आरोपों में गिरफ्तार अमेरिकी नागरिक को मिली जमानत

सरिता त्रिपाठी
नई दिल्ली

राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद जैसे अत्यंत संवेदनशील मामलों की जांच करने वाली देश की प्रमुख और सर्वोच्च जांच एजेंसी, राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) की कार्यप्रणाली पर एक बहुत बड़ा और गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया है। देश की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े एक अत्यंत हाई-प्रोफाइल मामले में जांच एजेंसी की प्रशासनिक और विधिक सुस्ती के कारण एक विदेशी नागरिक को कानूनी राहत मिल गई है। प्राप्त न्यायिक प्रतिवेदनों के अनुसार, एनआईए द्वारा आतंकवाद के आरोपों में गिरफ्तार किए गए एक अमेरिकी नागरिक को एक सौ अस्सी दिन (180-day) की जांच समय-सीमा समाप्त होने के बाद जमानत मिल गई है। यह घटना जांच एजेंसियों की दक्षता और उनकी विधिक प्रतिबद्धता पर एक बहुत गहरी चोट है।

यह मामला श्री डाइक (Mr. Dyke) नामक एक अमेरिकी नागरिक से जुड़ा हुआ है, जिसे देश-विरोधी और आतंकवादी गतिविधियों में कथित संलिप्तता के कारण गिरफ्तार किया गया था। शुरुआत में, जब यह गिरफ्तारी हुई थी, तब इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से एक बहुत बड़ी सफलता माना जा रहा था। उन्हें देश के सबसे कठोर कानूनों में से एक के तहत निरुद्ध किया गया था। परंतु, जैसे-जैसे जांच का समय आगे बढ़ा, जांच एजेंसी अपनी ही कानूनी प्रक्रियाओं के जाल में उलझती हुई प्रतीत हुई।

न्यायालय ने इस मामले में जमानत देते समय जांच एजेंसी की घोर लापरवाही को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया। अदालत ने श्री डाइक की जमानत याचिका को यह पाते हुए स्वीकार कर लिया कि आठ सितंबर को एनआईए द्वारा दायर आरोप पत्र में केवल आव्रजन और विदेशी अधिनियम की धारा इक्कीस और तेईस के “आंशिक” आरोपों का ही आह्वान किया गया था। न्यायालय ने अपने निर्णय में इस बात पर गहरा आश्चर्य और रोष व्यक्त किया कि एजेंसी ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की अधिक गंभीर धारा अठारह को आरोप पत्र में शामिल ही नहीं किया, जिसके तहत श्री डाइक पर मूल रूप से मामला दर्ज किया गया था।

यूएपीए की धारा अठारह आतंकवादी कृत्य करने की साजिश रचने से संबंधित एक अत्यंत गंभीर और गैर-जमानती अपराध है। इस कानून के तहत जांच एजेंसियों को आरोप पत्र दायर करने के लिए अधिकतम एक सौ अस्सी दिनों का अतिरिक्त समय दिया जाता है। लेकिन इस लंबी अवधि के बावजूद, यदि एनआईए केवल वीज़ा नियमों के उल्लंघन (आव्रजन अधिनियम) जैसे मामूली और ‘आंशिक’ (piecemeal) आरोप ही सिद्ध कर पाई, तो यह जांच की गुणवत्ता पर एक बहुत बड़ा सवाल है। कानून के स्थापित सिद्धांत के अनुसार, यदि तय समय-सीमा के भीतर एक पूर्ण और वैध आरोप पत्र दायर नहीं किया जाता है, तो आरोपी ‘डिफ़ॉल्ट जमानत’ (default bail) का वैधानिक हकदार हो जाता है।

इस घटना ने विदेशी नागरिकों से जुड़े राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में भारत की कानूनी सख्ती को कमज़ोर किया है। एक व्यक्ति जिसे शुरुआत में एक खूंखार आतंकवादी साजिशकर्ता के रूप में प्रस्तुत किया गया था, उसका महज़ कागजी खानापूर्ति और समय-सीमा के उल्लंघन के कारण छूट जाना, सुरक्षा व्यवस्था में एक बहुत बड़ी दरार को दर्शाता है। एनआईए को अब न केवल न्यायालय में अपने इस अधूरे आरोप पत्र का बचाव करना होगा, बल्कि देश को यह भी स्पष्ट करना होगा कि आखिर इतनी बड़ी विफलता कैसे और किन अधिकारियों की लापरवाही से हुई। यह प्रकरण जांच एजेंसियों के लिए एक कड़ा सबक है कि केवल गिरफ्तारी ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समयबद्ध और साक्ष्य-आधारित जांच न्याय सुनिश्चित करने के लिए सबसे अनिवार्य शर्त है।