‘बांग्लादेशी’ होने के घोर संदेह में हिरासत में लिए गए बंगाल के उन्नीस प्रवासी मज़दूरों को छत्तीसगढ़ से अंततः किया गया रिहा

सरिता त्रिपाठी
कोलकाता / रायपुर
भारत राष्ट्र के भीतर एक राज्य से दूसरे राज्य में आजीविका और रोज़गार की तलाश में जाने वाले असंगठित और गरीब प्रवासी मज़दूरों के समक्ष आने वाली गंभीर और अमानवीय चुनौतियों को उजागर करने वाला एक बेहद विचलित करने वाला मामला सामने आया है। अपने ही देश की सीमाओं के भीतर पहचान के संकट और भाषाई भेदभाव का सामना कर रहे इन मज़दूरों को एक गहरी मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना से गुज़रना पड़ा है। हाल ही में सामने आई एक प्रामाणिक रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ में ‘बांग्लादेशी’ नागरिक होने के गंभीर और निराधार संदेह के आधार पर हिरासत में लिए गए पश्चिम बंगाल के उन्नीस प्रवासी मज़दूरों को अंततः रिहा कर दिया गया है।
यह दुखद घटना देश के भीतर बढ़ती क्षेत्रीय संवेदनशीलता और बिना किसी उचित जांच-पड़ताल के की जाने वाली जल्दबाज़ी भरी प्रशासनिक कार्रवाइयों पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है। उन्नीस सितंबर, दो हज़ार छब्बीस को सेनजुती सेनगुप्ता द्वारा कोलकाता से प्रकाशित की गई इस विस्तृत रिपोर्ट में इस संपूर्ण घटनाक्रम का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, पश्चिम बंगाल के ये उन्नीस गरीब प्रवासी मज़दूर रोज़गार की तलाश में छत्तीसगढ़ गए थे, जहां उन्हें केवल बांग्लादेशी राष्ट्रीयता वाले होने के संदेह के आधार पर स्थानीय पुलिस प्रशासन द्वारा हिरासत में ले लिया गया था।
इन गरीब और कमज़ोर मज़दूरों के लिए यह एक अत्यंत भयानक, डरावना और अपमानजनक अनुभव था। केवल उनकी भाषा (बंगाली) और वेशभूषा के आधार पर उन्हें विदेशी और अवैध घुसपैठिया मान लेना स्थानीय खुफिया और पुलिस तंत्र की एक बहुत बड़ी विफलता और पूर्वाग्रह को दर्शाता है। एक लंबी प्रशासनिक जद्दोजहद, उनके पहचान पत्रों के सघन सत्यापन और राज्य सरकार के संभावित हस्तक्षेप के पश्चात अंततः सच्चाई सामने आई। रिपोर्ट इस बात की पूर्ण पुष्टि करती है कि अपनी प्रामाणिक भारतीय नागरिकता साबित करने के बाद इन सभी उन्नीस मज़दूरों को शुक्रवार, अठारह सितंबर, दो हज़ार छब्बीस को छत्तीसगढ़ से आधिकारिक रूप से रिहा कर दिया गया है।
इस घटना ने पूरे देश में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, मज़दूर संगठनों और राजनीतिक दलों के बीच एक नई और अत्यंत गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। भारत का सर्वोच्च संविधान देश के प्रत्येक नागरिक को किसी भी राज्य में स्वतंत्र रूप से जाने, निर्बाध रूप से रहने और आजीविका कमाने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। पश्चिम बंगाल से बड़ी संख्या में श्रमिक निर्माण कार्यों, कृषि और कारखानों में अपना खून-पसीना बहाने के लिए देश के अन्य हिस्सों में पलायन करते हैं। ऐसे में केवल उनके भाषाई और सांस्कृतिक अंतर के कारण उन्हें ‘बांग्लादेशी’ कहकर प्रताड़ित करना और उन्हें कारावास में डाल देना एक अत्यंत निंदनीय और शर्मनाक कृत्य है।
यह संवेदनशील मामला उन गहराती सामाजिक और राजनीतिक दरारों को भी उजागर करता है जहां अवैध आव्रजन के नाम पर अक्सर निर्दोष भारतीय नागरिकों को ही अनावश्यक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। जब इन मज़दूरों को पुलिस हिरासत में लिया गया होगा, तो उनके निर्धन परिवारों पर क्या बीती होगी, इसकी कल्पना करना भी अत्यंत पीड़ादायक है। रोज़ाना दिहाड़ी कमाने वाले इन असंगठित श्रमिकों के पास अक्सर कोई कानूनी सहायता या बड़े प्रशासनिक संपर्क नहीं होते हैं। ऐसे में प्रशासनिक व्यवस्था की यह पहली और सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है कि वह किसी भी व्यक्ति को केवल संदेह मात्र के आधार पर तब तक अपराधी या विदेशी न माने जब तक कि उसके खिलाफ कोई ठोस और अकाट्य प्रमाण उपलब्ध न हो।