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विदेशी अंशदान संशोधन पर संयुक्त संसदीय समिति में तीखी बहस: केंद्र के संपत्ति अधिग्रहण प्रावधानों पर उठे गंभीर प्रश्न

गृह मंत्रालय ने संशोधनों को पारदर्शिता के लिए आवश्यक बताया; विपक्ष ने ‘नामित प्राधिकरण’ की असीमित शक्तियों पर व्यक्त की गहरी चिंता

अभिषेक सिंह
नई दिल्ली

भारत के लोकतांत्रिक और विधायी ढांचे में विदेशी धन के प्रवाह को नियंत्रित करने वाले कानूनों पर एक अत्यंत गहन और तीखी बहस छिड़ गई है। गैर-सरकारी संगठनों और नागरिक समाज के कार्यों को प्रभावित करने वाले ‘विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम’ (एफसीआरए) में प्रस्तावित संशोधनों की समीक्षा के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति की बैठकों का दौर आरंभ हो गया है। इन बैठकों के भीतर पक्ष और विपक्ष के बीच गहरे वैचारिक और वैधानिक मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। प्राप्त आधिकारिक जानकारी के अनुसार, संयुक्त संसदीय समिति के सदस्यों ने एफसीआरए संशोधनों में विदेशी निधि और संपत्ति अधिग्रहण के प्रावधानों को लेकर केंद्र सरकार से कड़े सवाल किए हैं।

इस महत्वपूर्ण समिति की प्रारंभिक बैठक के दौरान सरकार और विपक्ष के मध्य तीखी नोकझोंक देखने को मिली। अपनी पहली बैठक में, गृह मंत्रालय ने प्रस्तावित बदलावों का बचाव करते हुए इन्हें पारदर्शिता और जवाबदेही में सुधार के उपायों के रूप में प्रस्तुत किया। गृह मंत्रालय (एमएचए) ने समिति के समक्ष अपनी आधिकारिक प्रस्तुति में स्पष्ट रूप से कहा कि इन प्रस्तावित संशोधनों का मुख्य उद्देश्य विदेशी अंशदान के उपयोग को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। सरकार का यह दृढ़ तर्क है कि देश के भीतर आने वाले विदेशी धन का उपयोग राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों या उन कार्यों में नहीं होना चाहिए जो देश के आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाते हों। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कानूनों को अधिक सख्त बनाना समय की मांग है।

परंतु, संसदीय समिति में शामिल विपक्षी दलों के सदस्यों ने सरकार की इस मंशा पर गंभीर संदेह व्यक्त किया है। विपक्ष का मुख्य विरोध उन प्रावधानों को लेकर है जो सरकारी अधिकारियों को अत्यधिक शक्तियां प्रदान करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, विपक्ष ने प्रस्तावित “नामित प्राधिकरण” की शक्तियों पर गहरे सवाल उठाए हैं। विपक्षी सदस्यों का तर्क है कि ‘नामित प्राधिकरण’ को किसी भी संस्था की संपत्ति का अधिग्रहण करने या उसके विदेशी धन के प्रवाह को बिना किसी ठोस न्यायिक प्रक्रिया के रोकने की असीमित शक्ति देना, एक अत्यंत दमनकारी कदम साबित हो सकता है। यह प्रावधान सरकार को उन गैर-सरकारी संगठनों और नागरिक अधिकार समूहों को निशाना बनाने का एक खुला हथियार प्रदान कर सकता है जो सरकार की नीतियों से असहमति जताते हैं या आलोचनात्मक रुख अपनाते हैं।

भारत में नागरिक समाज हमेशा से लोकतंत्र का एक सशक्त और महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, और मानवाधिकारों के क्षेत्र में कार्य करने वाली अनगिनत संस्थाएं विदेशी अनुदान पर निर्भर करती हैं। एफसीआरए के नियमों में निरंतर की जा रही सख्ती ने पहले ही कई अंतरराष्ट्रीय और घरेलू संस्थाओं के कामकाज को गंभीर रूप से बाधित किया है। अब इन नए संपत्ति अधिग्रहण प्रावधानों ने इस चिंता को और अधिक गहरा कर दिया है कि कहीं पारदर्शिता के नाम पर स्वतंत्र आवाज़ों को पूरी तरह से कुचलने का प्रयास तो नहीं किया जा रहा है।

आगामी बैठकों में इस बात पर सघन चर्चा होने की संभावना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संस्थागत स्वतंत्रता के मध्य एक उचित संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। संयुक्त संसदीय समिति की यह जिम्मेदारी है कि वह इन संशोधनों के हर पहलू का सूक्ष्मता से परीक्षण करे और यह सुनिश्चित करे कि नए प्रावधान संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का किसी भी रूप में उल्लंघन न करें। जब तक इन प्रस्तावित ‘नामित प्राधिकरणों’ की शक्तियों पर उचित नियंत्रण और संतुलन (चेक एंड बैलेंस) स्थापित नहीं किया जाता, तब तक इस विधायी विवाद के शांत होने की कोई संभावना दृष्टिगोचर नहीं होती है।