निठारी के कुख्यात हत्याकांडों से बरी हुए सुरेंद्र कोली का रहस्यमय अंत, हरिद्वार में मिला मृत

सर्वोच्च न्यायालय से दोषमुक्त होने के पश्चात फर्जी पहचान के साथ एक निजी कंपनी में सुरक्षा गार्ड के रूप में कर रहा था कार्य
राघवेन्द्र प्रताप सिंह
हरिद्वार
भारतीय आपराधिक इतिहास के सबसे खौफनाक, वीभत्स और हृदयविदारक अध्यायों में से एक, निठारी कांड के मुख्य आरोपियों में से एक का अंत अत्यंत रहस्यमय और विडंबनापूर्ण परिस्थितियों में हुआ है। देश को झकझोर कर रख देने वाले इस मामले में लंबी कानूनी लड़ाई के बाद हाल ही में बरी हुए व्यक्ति की मृत्यु ने सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। प्राप्त समाचारों और पुलिस की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, निठारी हत्याकांड के लिए बरी किए गए सुरेंद्र कोली को हरिद्वार में मृत पाया गया है। इस व्यक्ति के जीवन और मृत्यु का यह घटनाक्रम भारतीय न्याय प्रणाली और समाज की जटिलताओं को गहराई से उजागर करता है।
सुरेंद्र कोली का नाम सुनते ही वर्ष दो हज़ार छह का वह भयावह मंज़र आंखों के सामने आ जाता है, जब नोएडा के निठारी गांव में एक कोठी के नाले से दर्जनों मासूम बच्चों और महिलाओं के कंकाल बरामद हुए थे। इस वीभत्स रहस्योद्घाटन ने पूरे राष्ट्र की आत्मा को कंपा दिया था। इस मामले में कोली को मुख्य अभियुक्त बनाया गया था और उसे निचली अदालतों तथा उच्च न्यायालय द्वारा मृत्युदंड की सज़ा भी सुनाई गई थी। बारह मई, दो हज़ार दस की एक पुरानी तस्वीर में निठारी मामले के आरोपी सुरेंद्र कोली को गाजियाबाद की डासना जेल से केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की अदालत में ले जाते हुए देखा जा सकता है।
हालांकि, देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था में इस मामले ने एक बिल्कुल ही अलग मोड़ ले लिया। पुलिस सूत्रों के अनुसार, नवंबर दो हज़ार पच्चीस में सर्वोच्च न्यायालय से बरी होने के तुरंत बाद कोली हरिद्वार आ गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने अभियोजन पक्ष की साक्ष्य संबंधी विसंगतियों और जांच एजेंसियों की भारी खामियों को आधार बनाते हुए उसे इस खौफनाक मामले से दोषमुक्त कर दिया था। यह रिहाई उस समय भी भारी जन-आक्रोश और कानूनी बहसों का केंद्र बनी थी, क्योंकि जिन मासूमों ने अपनी जान गंवाई थी, उनके परिवारों को न्याय मिलने की अंतिम उम्मीद भी इस फैसले के साथ टूट गई थी।
रिहाई के पश्चात का उसका जीवन भी अपराध और छलावे से अछूता नहीं रहा। पुलिस सूत्रों ने इस बात की पुष्टि की है कि हरिद्वार पहुंचने के बाद उसने फर्जी पहचान का उपयोग करते हुए एक निजी फर्म में सुरक्षा गार्ड के रूप में काम करना शुरू कर दिया था। जिस व्यक्ति पर कभी इतने जघन्य अपराधों के आरोप लगे हों, उसका एक फर्जी पहचान के सहारे सुरक्षा गार्ड की नौकरी प्राप्त कर लेना, हमारी निजी सुरक्षा एजेंसियों की पृष्ठभूमि सत्यापन (बैकग्राउंड वेरिफिकेशन) प्रक्रिया पर भी अत्यंत गंभीर सवाल खड़े करता है।
एक ‘सुरक्षा गार्ड’ के वेश में छिपकर जीवन व्यतीत कर रहे कोली की मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई, यह अभी तक जांच का विषय है। उसकी मृत्यु प्राकृतिक थी, या इसके पीछे कोई गहरा षड्यंत्र है, इसकी गुत्थी सुलझाना अब स्थानीय पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। सुरेंद्र कोली का मृत पाया जाना उस अंधकारमय अध्याय का एक ऐसा अंत है जो अपने पीछे अनगिनत अनुत्तरित प्रश्न छोड़ गया है। निठारी के पीड़ितों के परिवार आज भी उसी दर्द के साथ जी रहे हैं, और मुख्य आरोपी की इस प्रकार एकांत और गुमनामी में हुई मृत्यु यह साबित करती है कि कई बार कानूनी न्याय और प्राकृतिक न्याय के मध्य एक बहुत बड़ी और गहरी खाई मौजूद होती है।