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शिशु पोषण उत्पादों में भ्रामक दावों पर कड़ा संज्ञान, खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण ने नेस्ले इंडिया के विरुद्ध आरंभ की वैधानिक कार्रवाई

‘फाइव एचएमओ’ और ‘व्हे प्रोटीन’ जैसे दावों पर नेस्ले इंडिया से मांगा गया स्पष्टीकरण; ई-कॉमर्स मंचों पर उपलब्ध प्रचार सामग्री की भी हुई सूक्ष्म जांच

विवेक ओझा
नई दिल्ली : भारत में शिशु स्वास्थ्य और उनके लिए बाज़ार में उपलब्ध पोषण उत्पादों की गुणवत्ता और सुरक्षा हमेशा से एक अत्यंत संवेदनशील और सर्वोच्च प्राथमिकता वाला विषय रहा है। शिशुओं के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए बेचे जाने वाले उत्पादों में किसी भी प्रकार की भ्रामक जानकारी या मानकों का उल्लंघन देश के भविष्य के साथ एक सीधा और गंभीर खिलवाड़ माना जाता है। इसी परिप्रेक्ष्य में, देश के सर्वोच्च खाद्य नियामक निकाय ने एक बहुराष्ट्रीय और स्थापित कंपनी के विरुद्ध अत्यंत कड़ा कदम उठाया है। प्राप्त आधिकारिक सूचनाओं के अनुसार, भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने शिशु पोषण उत्पादों को लेकर नेस्ले इंडिया के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई आरंभ कर दी है।

यह पूरी कार्रवाई मुख्य रूप से कंपनी द्वारा अपने उत्पादों के संदर्भ में किए जा रहे उन दावों से संबंधित है, जिनकी वैज्ञानिक और वैधानिक प्रामाणिकता पर प्राधिकरण को गहरा संदेह है। उन्नीस सितंबर, दो हज़ार छब्बीस को पीटीआई द्वारा नई दिल्ली से प्रकाशित इस रिपोर्ट के अनुसार, एफएसएसएआई ने ‘फाइव एचएमओ’ (5HMOs) और ‘व्हे प्रोटीन’ (Whey Protein) से संबंधित विभिन्न दावों के विषय में नेस्ले इंडिया से आधिकारिक रूप से विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा है। शिशु आहार में इस प्रकार के जटिल वैज्ञानिक शब्दों का उपयोग प्रायः उपभोक्ताओं और विशेषकर माता-पिता को यह विश्वास दिलाने के लिए किया जाता है कि यह उत्पाद प्राकृतिक मातृ दुग्ध के बिल्कुल समान या उससे भी बेहतर है, जो कि खाद्य सुरक्षा नियमों के अंतर्गत एक गंभीर जांच का विषय है।

खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण ने इस मामले की गहनता और सूक्ष्मता से जांच करते हुए नेस्ले के कई प्रमुख शिशु उत्पाद ब्रांडों को अपनी समीक्षा के दायरे में लिया है। जांच दल ने विशेष रूप से नेस्ले के ‘नैन एक्सेला प्रो स्टेज वन’ (NAN Excella Pro Stage 1), ‘लैक्टोजेन प्रो वन’ (Lactogen Pro 1), और एक अन्य ‘फॉलो-अप फॉर्मूला’ उत्पाद का बारीकी से परीक्षण किया है। इसके अतिरिक्त, प्राधिकरण ने केवल भौतिक उत्पादों तक ही अपनी जांच सीमित नहीं रखी है, बल्कि विभिन्न ई-कॉमर्स मंचों (ऑनलाइन बिक्री वेबसाइटों) पर उपलब्ध इनकी संपूर्ण प्रचार सामग्री (प्रमोशनल मटेरियल) का भी सघन निरीक्षण किया है।

शिशु आहार विज्ञापन अधिनियम के अंतर्गत कंपनियों को अपने उत्पादों का विपणन करते समय अत्यंत कड़े दिशा-निर्देशों का पालन करना होता है। किसी भी कृत्रिम शिशु आहार को मातृ दुग्ध के विकल्प के रूप में इस प्रकार प्रचारित नहीं किया जा सकता जिससे स्तनपान को हतोत्साहित किया जाए। ‘व्हे प्रोटीन’ और ‘एचएमओ’ जैसे तत्वों को लेकर किए गए अतिरंजित दावे यदि वैज्ञानिक साक्ष्यों से पुष्ट नहीं होते हैं, तो यह सीधे तौर पर भ्रामक विज्ञापन की श्रेणी में आता है।

इस कड़ी वैधानिक कार्रवाई से बहुराष्ट्रीय कंपनियों को एक बहुत ही स्पष्ट और सख्त संदेश दिया गया है कि भारत में व्यापार करते समय वे शिशु स्वास्थ्य और वैधानिक मानकों के साथ कोई समझौता नहीं कर सकतीं। एफएसएसएआई का यह कदम न केवल लाखों शिशुओं के स्वास्थ्य की रक्षा करने की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सराहनीय पहल है, बल्कि यह देश के उपभोक्ताओं को भी जागरूक करने का प्रयास है कि वे विज्ञापनों में दिखाए गए बड़े-बड़े दावों पर आंख मूंदकर विश्वास न करें। अब यह नेस्ले इंडिया पर निर्भर करता है कि वह प्राधिकरण के समक्ष अपने दावों की प्रामाणिकता को किस प्रकार से सिद्ध करती है।