समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर देशव्यापी और सघन विमर्श: क्या है पूरा विवाद? | एक विश्लेषणात्मक विवरण
व्यक्तिगत कानूनों की वर्तमान स्थिति, संवैधानिक प्रावधान, पक्ष-विपक्ष के तर्क और महिला अधिकारों की समानता पर विस्तृत अध्ययन
अभिषेक सिंह
नई दिल्ली : भारतीय लोकतांत्रिक गणराज्य के राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में सबसे ज्वलंत, संवेदनशील और ऐतिहासिक विषयों में से एक ‘समान नागरिक संहिता’ (यूसीसी) पर बहस अब एक अत्यंत निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। देश की विविधतापूर्ण संस्कृति और विभिन्न धर्मों के अपने अलग-अलग कानूनों के बीच एक समान व्यवस्था स्थापित करने की यह मांग निरंतर गति पकड़ रही है। अठारह सितंबर, दो हज़ार छब्बीस को रंगराजन आर. द्वारा प्रकाशित एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट में इस पूरे विवाद और ‘समान नागरिक संहिता पर देशव्यापी विमर्श’ का अत्यंत गहराई से विवरण प्रस्तुत किया गया है। यह विषय न केवल कानूनी और वैधानिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह देश के सामाजिक ताने-बाने को भी गहरे स्तर पर प्रभावित करता है।
इस विस्तृत रिपोर्ट में कई अत्यंत महत्वपूर्ण और बुनियादी प्रश्नों को संबोधित करते हुए एक समग्र विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। रिपोर्ट इस बात की पड़ताल करती है कि वर्तमान समय में देश के विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों (पर्सनल लॉ) को किस प्रकार से संचालित किया जाता है। भारत में वर्तमान में विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे विषय हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदायों के अपने अलग-अलग धार्मिक कानूनों के आधार पर तय किए जाते हैं। रिपोर्ट आगे यह भी स्पष्ट करती है कि भारत का सर्वोच्च संविधान यूसीसी (समान नागरिक संहिता) के बारे में क्या कहता है। संविधान के अनुच्छेद चवालीस के अंतर्गत राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में यह स्पष्ट रूप से अंकित है कि राज्य पूरे भारत के राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का निरंतर प्रयास करेगा।
इस वैचारिक बहस के दोनों पक्षों का मूल्यांकन करना भी अत्यंत आवश्यक है। रिपोर्ट इस बात पर प्रकाश डालती है कि संपूर्ण देश में एक समान यूसीसी लागू करने के पक्ष में और उसके विरोध में मुख्य तर्क क्या हैं। इसके समर्थकों का यह दृढ़ मानना है कि यूसीसी राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करेगा, न्याय प्रणाली को अत्यंत सरल बनाएगा और यह सुनिश्चित करेगा कि एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में सभी नागरिकों पर एक समान कानून लागू हों। वहीं, इसके आलोचक और विरोध करने वाले गुट इसे देश की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता पर एक बहुत बड़ा आघात मानते हैं। उनका यह तर्क है कि यह अल्पसंख्यक समुदायों के धार्मिक अधिकारों में अनावश्यक और अनुचित सरकारी हस्तक्षेप है।
इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण और केंद्रीय बिंदु लैंगिक न्याय और महिला सशक्तिकरण है। रिपोर्ट में यह सवाल उठाया गया है कि एक समान नागरिक संहिता किस प्रकार से महिलाओं के लिए समान अधिकारों की गारंटी दे सकती है। वर्तमान में कई धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों में महिलाओं को संपत्ति और तलाक के मामलों में पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त नहीं हैं। यूसीसी का उद्देश्य इन सभी भेदभावपूर्ण और पितृसत्तात्मक नियमों को समाप्त कर एक ऐसा कानून बनाना है जहां सभी महिलाओं को पूर्ण रूप से समान कानूनी अधिकार प्राप्त हों।
इस दिशा में कुछ राज्यों ने पहले ही अपने स्तर पर कड़े कदम उठा लिए हैं। रिपोर्ट में इस ऐतिहासिक तथ्य का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि उत्तराखंड राज्य में जनवरी दो हज़ार पच्चीस से ही समान नागरिक संहिता पूरी तरह से लागू है। उत्तराखंड का यह साहसिक कदम देश के अन्य राज्यों के लिए एक मार्गदर्शक या परीक्षण के रूप में कार्य कर रहा है। इसके साथ ही इस विमर्श में यह भी देखा जा रहा है कि पूरी तरह से यूसीसी लागू करने के स्थान पर क्या कोई अन्य वैकल्पिक व्यवस्था भी प्रस्तावित की गई है। यह संपूर्ण विषय भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता की एक बहुत बड़ी परीक्षा है, जहां अधिकारों की समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच एक अत्यंत सूक्ष्म और आदर्श संतुलन स्थापित करना राष्ट्र की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।