दिल्ली मतदाता सूची पुनरीक्षण में घोर प्रशासनिक लापरवाही: दिवंगत अर्थशास्त्री और शीर्ष नेताओं को जारी हुए सूचना पत्र

‘नो मैपिंग’ (गैर-मानचित्रण) श्रेणी के अंतर्गत बिबेक देबरॉय, एस जयशंकर और लालकृष्ण आडवाणी के नाम हुए चिह्नित; चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर प्रश्न
अभिषेक सिंह
नई दिल्ली
भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करने के लिए सबसे प्राथमिक और अत्यंत आवश्यक कदम एक त्रुटिहीन मतदाता सूची का निर्माण करना होता है। मतदाता सूची अद्यतनीकरण की प्रक्रिया को एक अत्यंत पवित्र और ज़िम्मेदारी भरा कार्य माना जाता है। परंतु, देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में इस प्रक्रिया के दौरान एक ऐसी घोर प्रशासनिक लापरवाही और हास्यास्पद विसंगति सामने आई है, जिसने निर्वाचन आयोग के जमीनी स्तर के कार्यप्रणाली तंत्र पर एक बहुत बड़ा और गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। प्राप्त आधिकारिक जानकारियों और समाचार प्रतिवेदनों के अनुसार, विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान कई ऐसे प्रतिष्ठित और शीर्ष व्यक्तियों के नामों को नोटिस (सूचना पत्र) जारी करने के लिए चिह्नित किया गया है, जो या तो अब इस दुनिया में नहीं हैं या देश के अति-विशिष्ट नागरिक हैं।
इस घोर लापरवाही का सबसे चौंकाने वाला और पीड़ादायक उदाहरण देश के एक अत्यंत प्रतिष्ठित विद्वान से जुड़ा हुआ है। आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, अर्थशास्त्री और पद्म पुरस्कार से सम्मानित बिबेक देबरॉय, जिनका नवंबर दो हज़ार चौबीस में निधन हो गया था, उनका नाम प्रारूप मतदाता सूची में था। एक ऐसे व्यक्ति को जो दिवंगत हो चुके हैं, मतदाता सूची के सत्यापन की प्रक्रिया में शामिल रखना और उनके नाम को ‘नो मैपिंग’ (गैर-मानचित्रण) श्रेणी के तहत चिह्नित किया जाना (flagged under ‘no mapping’ category) जमीनी स्तर पर कार्य कर रहे अधिकारियों की पूर्ण संवेदनहीनता और आंकड़ों के सत्यापन में बरती जा रही भारी ढिलाई को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। वर्ष दो हज़ार चौबीस में दिवंगत हुए बिबेक देबरॉय को दिल्ली एसआईआर में नोटिस के लिए चिह्नित किया गया है।
यह प्रशासनिक भूल केवल एक व्यक्ति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इस त्रुटिपूर्ण सूची में देश के वर्तमान और पूर्व शीर्ष नीति-निर्माताओं के नाम भी बेतरतीब ढंग से शामिल कर लिए गए हैं। प्रतिवेदन में इस बात का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि देश के वर्तमान विदेश मंत्री एस जयशंकर और भारतीय राजनीति के वरिष्ठतम राजनेता लालकृष्ण आडवाणी भी इस सूची में शामिल हैं। ऐसे अति-विशिष्ट व्यक्तियों, जिनकी सुरक्षा और निवास स्थान का पूरा विवरण राज्य तंत्र के पास हर समय मौजूद होता है, उनके नामों को पते के सत्यापन या गैर-मानचित्रण जैसी श्रेणियों में डालकर नोटिस भेजने की प्रक्रिया अत्यंत ही हास्यास्पद और अव्यवहारिक प्रतीत होती है।
यह विसंगति यहीं नहीं रुकती, बल्कि इसमें वे अधिकारी भी शामिल हैं जो स्वयं चुनाव प्रक्रियाओं का संचालन करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू, दिल्ली के पूर्व उप मुख्यमंत्री सिसोदिया और विदेश सचिव विक्रम मिस्री भी उन लोगों में शामिल थे जिन्हें दिल्ली में नोटिस के लिए पहचाना गया था। तस्वीर में चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू को एक आधिकारिक कार्यक्रम के दौरान बैठे हुए देखा जा सकता है, और विडंबना यह है कि उन्हीं के विभाग के निचले स्तर के कर्मचारियों द्वारा उनके ही निवास स्थान या मतदाता पहचान को लेकर एक संदेहास्पद सूची तैयार कर दी गई है।
मतदाता सूची में इस प्रकार की भारी विसंगतियां यह सिद्ध करती हैं कि केवल तकनीकी उपकरणों और सॉफ्टवेयर पर निर्भरता पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए मानवीय बुद्धिमत्ता और घर-घर जाकर किए जाने वाले जमीनी सर्वेक्षण की गुणवत्ता में भारी सुधार की आवश्यकता है। जब देश के इतने बड़े और प्रतिष्ठित नागरिकों के नामों का सत्यापन सही ढंग से नहीं हो पा रहा है, तो एक आम नागरिक, जो झुग्गी-झोपड़ियों या किराए के मकानों में निवास करता है, उसके मताधिकार की सुरक्षा की गारंटी कैसे सुनिश्चित की जा सकती है? निर्वाचन आयोग के उच्चाधिकारियों को इस पूरे प्रकरण का तत्काल संज्ञान लेते हुए एक उच्च-स्तरीय विभागीय जांच बैठानी चाहिए और उन सभी लापरवाह अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी चाहिए, जिनके कारण इस प्रकार की दोषपूर्ण और त्रुटिपूर्ण प्रारूप सूची तैयार की गई। यह लोकतंत्र की मूल नींव को मजबूत करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।