टाटा समूह के शीर्ष नेतृत्व पर अभूतपूर्व विवाद: टाटा ट्रस्ट्स ने ‘निदेशक मंडल’ की बैठक में किसी भी प्रकार के गतिरोध से किया पूर्ण इनकार

एन. चंद्रशेखरन की टाटा संस के अध्यक्ष पद पर पुनर्नियुक्ति को बताया ‘अवैध’; निर्णायक मत के अधिकार को लेकर कॉरपोरेट जगत में छिड़ी नई और अत्यंत गंभीर बहस
विवेक ओझा
मुंबई
भारत के सबसे बड़े, प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक औद्योगिक घराने—टाटा समूह—के भीतर कॉर्पोरेट प्रशासन (कॉर्पोरेट गवर्नेंस) और नेतृत्व को लेकर एक ऐसा अभूतपूर्व और अत्यंत गंभीर विवाद उत्पन्न हो गया है, जिसने पूरे देश के शेयर बाज़ार और औद्योगिक जगत में एक भारी हलचल पैदा कर दी है। यह पूरा विवाद टाटा समूह की मुख्य होल्डिंग कंपनी (प्रवर्तक संस्था) टाटा संस और उसके बहुसंख्यक शेयरधारक (हिस्सेदार) टाटा ट्रस्ट्स के बीच अधिकारों की रस्साकशी को लेकर है। प्राप्त आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार, टाटा ट्रस्ट्स ने सत्रह सितंबर की निदेशक मंडल की बैठक में किसी भी प्रकार के गतिरोध से स्पष्ट रूप से इनकार किया है, और इसके साथ ही उसने निर्णायक मत (कास्टिंग वोट) के जनादेश या अधिकार पर भी कड़ा विवाद खड़ा कर दिया है।
इस पूरे विवाद के केंद्र में टाटा संस के वर्तमान और अत्यंत प्रभावशाली अध्यक्ष का भविष्य और उनकी नियुक्ति की विधिक वैधता का प्रश्न है। ललाटेंदु मिश्रा द्वारा प्रकाशित इस विश्लेषणात्मक रिपोर्ट के अनुसार, टाटा ट्रस्ट्स का यह स्पष्ट और कड़ा रुख है कि सत्रह सितंबर को हुई निदेशक मंडल की बैठक में एन. चंद्रशेखरन को टाटा संस के अध्यक्ष के रूप में फिर से नियुक्त करने (पुनर्नियुक्ति) के लिए जिस प्रस्ताव पर विचार किया गया था, वह वैध रूप से पारित नहीं हुआ था। टाटा ट्रस्ट्स ने इस अत्यंत महत्वपूर्ण प्रस्ताव को खारिज करते हुए यहां तक कहा है कि इस पुनर्नियुक्ति का कोई भी कानूनी प्रभाव (लीगल इफेक्ट) नहीं है।
यह बयान कॉर्पोरेट भारत के इतिहास में एक बहुत बड़ा और विचलित करने वाला भूचाल है। टाटा संस जैसी विशाल कंपनी, जो सौ से अधिक वैश्विक उद्यमों का संचालन करती है और देश की अर्थव्यवस्था में एक बहुत बड़ा योगदान देती है, उसके शीर्ष नेतृत्व पर इस प्रकार का खुला और सार्वजनिक विवाद कंपनी के लाखों कर्मचारियों, निवेशकों और वैश्विक भागीदारों के लिए एक गहरी चिंता का विषय है। एक संलग्न तस्वीर में टाटा संस के अध्यक्ष एन. चंद्रशेखरन को एक गंभीर मुद्रा में देखा जा सकता है, जो उनके समक्ष उत्पन्न हुए इस विशाल प्रशासनिक और वैधानिक संकट को भली-भांति दर्शाता है।
विवाद की जड़ में टाटा संस के अंतर्नियम (आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन) और उसमें निहित टाटा ट्रस्ट्स के वीटो (विशेषाधिकार) के अधिकार हैं। टाटा संस में कुल शेयरों का छाछठ प्रतिशत (66%) हिस्सा परोपकारी टाटा ट्रस्ट्स के पास है। नियमों के अनुसार, टाटा संस के अध्यक्ष की नियुक्ति या उनके कार्यकाल के विस्तार के लिए ट्रस्ट्स द्वारा नामित निदेशकों का सकारात्मक समर्थन प्राप्त होना अनिवार्य है। यदि निदेशक मंडल की बैठक में मतों का विभाजन बराबर होता है, तो क्या बैठक के अध्यक्ष को अपना निर्णायक मत (कास्टिंग वोट) डालने का कानूनी अधिकार है? यही वह सबसे बड़ा विधिक और तकनीकी बिंदु है जिस पर टाटा ट्रस्ट्स ने अपना सबसे कड़ा एतराज़ और विवाद (Dispute) दर्ज़ कराया है।
यह विवाद हमें कुछ वर्षों पूर्व साइरस मिस्त्री प्रकरण की कटु याद दिलाता है, जब इसी प्रकार के एक अधिकार क्षेत्र के संघर्ष ने टाटा समूह की साख को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी ठेस पहुंचाई थी। एन. चंद्रशेखरन के नेतृत्व में टाटा समूह ने पिछले कुछ वर्षों में विमानन, सेमीकंडक्टर और डिजिटल क्षेत्र में अत्यंत शानदार प्रगति की है और समूह का बाजार पूंजीकरण ऐतिहासिक ऊंचाइयों पर पहुंचा है। ऐसे में उनकी पुनर्नियुक्ति पर इस प्रकार के विवाद का उठना समूह की भावी विस्तार योजनाओं को अस्थिर कर सकता है। अब यह देखना अत्यंत महत्वपूर्ण होगा कि यह विवाद किसी मध्यस्थता के माध्यम से कंपनी के भीतर ही सुलझा लिया जाता है, या फिर यह एक बार फिर से देश की अदालतों की दहलीज तक पहुंचता है। कॉर्पोरेट प्रशासन की पारदर्शिता के लिए इस मामले का जल्द समाधान होना अत्यंत आवश्यक है।