कर्नाटक सरकार ने विवाह पंजीकरण के नियमों को किया अत्यधिक सख्त, आयु प्रमाण के रूप में आधार कार्ड पूरी तरह अमान्य

सरिता त्रिपाठी
बेंगलुरु : भारतीय समाज में बाल विवाह एक ऐसा गहरा और प्राचीन कलंक है जिसे समाप्त करने के लिए दशकों से कड़े कानून और निरंतर सामाजिक जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। इन तमाम प्रयासों के बावजूद, ग्रामीण और कुछ शहरी क्षेत्रों में लोग कानूनी खामियों और दस्तावेज़ों की हेराफेरी का लाभ उठाकर इस कुप्रथा को आज भी अंजाम दे रहे हैं। इसी गंभीर समस्या पर प्रहार करते हुए और बाल अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए, दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक की सरकार ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रशासनिक निर्णय लिया है। आधिकारिक समाचार रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक ने अपने विवाह पंजीकरण नियमों को अत्यधिक सख्त कर दिया है और स्पष्ट रूप से कहा है कि आधार कार्ड को आयु का प्रमाण नहीं माना जा सकता है।यह कड़ा प्रशासनिक कदम उठाने के पीछे कई अत्यंत चिंताजनक और चौंकाने वाले कारण रहे हैं। सरकार और बाल कल्याण समितियों के समक्ष लगातार ऐसे मामले आ रहे थे जहां विवाह के समय प्रस्तुत किए गए दस्तावेज़ों में भारी विसंगतियां पाई गईं। यह नया निर्देश विशेष रूप से उन घटनाओं के प्रकाश में आया है जहां आधार कार्ड और जन्म प्रमाण पत्र में अंकित उम्र बेमेल (अलग-अलग) थी, जिसके परिणामस्वरूप राज्य में चोरी-छिपे बाल विवाह संपन्न हो रहे थे। जब बाल विवाह निषेध अधिकारी इन विवाहों को रोकने पहुंचते थे, तो उन्हें फर्जी उम्र वाले दस्तावेज़ दिखाकर भ्रमित करने का प्रयास किया जाता था।इस पूरे फर्जीवाड़े में सबसे अधिक दुरुपयोग देश के सबसे प्रमुख पहचान पत्र, ‘आधार कार्ड’ का किया जा रहा था। राज्य भर में काम कर रहे बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस गंभीर षड्यंत्र को उजागर किया था। इन कार्यकर्ताओं ने प्रशासन के समक्ष यह आरोप लगाया था कि बाल विवाह को वैधानिक रूप देने के लिए दुल्हन के माता-पिता या उनके अभिभावकों ने जानबूझकर आधार कार्ड की छायाप्रति (फोटोकॉपी) में उसकी उम्र बदल दी थी। फोटोशॉप या अन्य तकनीकी माध्यमों से आधार कार्ड की छायाप्रति में उम्र को अठारह वर्ष से अधिक कर देना एक सामान्य अपराध बन गया था, जिसे विवाह पंजीकरण अधिकारी आसानी से पकड़ नहीं पाते थे। बाइस सितंबर, दो हज़ार छब्बीस को प्रकाशित इस रिपोर्ट और इसके साथ संलग्न एक पारंपरिक भारतीय विवाह के प्रतीकात्मक चित्र से यह स्पष्ट होता है कि विवाह जैसी पवित्र संस्था को किस प्रकार से दस्तावेज़ों की हेराफेरी से दूषित किया जा रहा था। विवाह पंजीकरण के समय आयु के पुख्ता और अकाट्य प्रमाण—जैसे कि नगर निगम द्वारा जारी वास्तविक जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल छोड़ने का प्रमाण पत्र (लीविंग सर्टिफिकेट) या दसवीं कक्षा की अंकसूची—को ही अब मान्यता दी जाएगी। आधार कार्ड मूल रूप से एक जनसांख्यिकीय पहचान और पते का प्रमाण है, जिसे आयु के अचूक प्रमाण के रूप में कभी भी वैधानिक मान्यता प्राप्त नहीं थी। कर्नाटक सरकार का यह नया और कड़ा निर्देश न केवल विवाह पंजीकरण की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और प्रामाणिक बनाएगा, बल्कि यह राज्य में बालिकाओं के भविष्य को सुरक्षित करने और उन्हें बाल विवाह की बेड़ियों से बचाने की दिशा में एक अत्यंत सशक्त और निर्णायक प्रहार सिद्ध होगा।