राष्ट्रगीत के सम्मान पर सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक और संवैधानिक वक्तव्य: निष्ठावान आपत्तिकर्ताओं पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं थोपी जा सकती

अभिषेक सिंह
नई दिल्ली : भारत के लोकतांत्रिक और संवैधानिक ढांचे में राष्ट्रवाद के प्रतीकों का सम्मान और व्यक्तिगत वैचारिक स्वतंत्रता के मध्य हमेशा से एक अत्यंत सूक्ष्म और संवेदनशील वैधानिक संतुलन रहा है। राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर समय-समय पर देश की न्यायपालिका में गंभीर और ऐतिहासिक बहसें होती रही हैं। इसी कड़ी में, राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के गायन और उसके प्रति असहमति व्यक्त करने वालों के अधिकारों को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाली टिप्पणी की है। प्राप्त विधिक और आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि राज्य राष्ट्रगीत तय कर सकता है, लेकिन अंतरात्मा की आवाज़ पर विरोध करने वालों (निष्ठावान आपत्तिकर्ताओं) पर वह किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई नहीं थोप सकता है।यह मामला एक ऐसे नए कानून से जुड़ा है जिसे हाल ही में लागू किया गया था और जो नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा प्रभाव डालता है। सर्वोच्च न्यायालय की यह महत्वपूर्ण टिप्पणी एक ऐसी जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए आई है, जिसने सीधे तौर पर सरकार के इस नए संशोधन को कटघरे में खड़ा कर दिया है। न्यायालय ने प्रसिद्ध कर्नाटक संगीतकार (प्रख्यात गायक) और लेखक टी.एम. कृष्णा द्वारा दायर की गई एक अत्यंत महत्वपूर्ण याचिका पर केंद्र सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है। अपनी बेबाक राय और मानवाधिकारों की वकालत के लिए विख्यात, टी.एम. कृष्णा की यह याचिका राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम, दो हज़ार छब्बीस को सीधे तौर पर चुनौती देती है।याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह है कि देश के नागरिकों को किसी भी राष्ट्रीय प्रतीक का सम्मान करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता यदि वह उनकी अंतरात्मा, धार्मिक विश्वासों या वैचारिक मान्यताओं के विरुद्ध हो। इस जनहित याचिका में विस्तार से बताया गया है कि उक्त अधिनियम की संशोधित धारा तीन न केवल राष्ट्रीय प्रोटोकॉल (शिष्टाचार) को विनियमित करती है और सार्वजनिक कार्यों के लिए एक समान आचार संहिता निर्धारित करती है, बल्कि यह एक ऐसे प्रतीक के प्रति ‘सहमति के समारोह’ के लिए भी नागरिकों को विवश (मजबूर) करती है। याचिका के अनुसार, किसी भी लोकतांत्रिक देश में देशभक्ति को बलपूर्वक या दंडात्मक कानूनों के भय से लागू नहीं किया जा सकता है।संलग्न चित्र में एक सार्वजनिक समारोह के दौरान राजनेताओं और गणमान्य व्यक्तियों को ‘वंदे मातरम’ की सुंदर पुष्प सज्जा के पीछे खड़े होकर राष्ट्रगीत के सम्मान में खड़े हुए देखा जा सकता है। यह दृश्य देश में इन प्रतीकों के प्रति गहरे सम्मान को दर्शाता है। परंतु, सर्वोच्च न्यायालय का यह विचारणीय प्रश्न है कि यदि कोई नागरिक अपने विशेष धार्मिक या व्यक्तिगत विश्वास (जैसे जेनोवा के साक्षियों का ऐतिहासिक मामला) के कारण इस गीत को गाने या इसके लिए खड़े होने से विनम्रतापूर्वक इनकार करता है, तो क्या उसे अपराधी मानकर जेल में डाल दिया जाना चाहिए?न्यायालय की यह टिप्पणी भारतीय संविधान के अनुच्छेद उन्नीस (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद पच्चीस (अंतरात्मा की स्वतंत्रता) की रक्षा की दिशा में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर है। राज्य को राष्ट्रीय गौरव के प्रतीकों को स्थापित करने का पूर्ण अधिकार है, परंतु यह अधिकार नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उनके ‘मौन रहने के अधिकार’ को कुचल कर प्राप्त नहीं किया जा सकता। अब सभी की दृष्टि इस बात पर टिकी है कि केंद्र सरकार इस जटिल संवैधानिक और भावनात्मक मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपना क्या विधिक तर्क और बचाव प्रस्तुत करती है।