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तृणमूल कांग्रेस का नाम और चुनाव चिह्न ज़ब्त होने पर ममता बनर्जी के पूर्ण समर्थन में उतरी कांग्रेस पार्टी

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने भारत निर्वाचन आयोग के फैसले की कड़ी आलोचना की; अठाईस वर्ष पुरानी पार्टी के अस्तित्व का संकट

राघवेन्द्र प्रताप सिंह/कोलकाता:

पश्चिम बंगाल की राजनीति में चल रहे भयंकर सत्ता संघर्ष और तृणमूल कांग्रेस के भीतर हुए ऐतिहासिक विभाजन ने अब एक व्यापक राष्ट्रीय राजनीतिक स्वरूप धारण कर लिया है। भारत निर्वाचन आयोग द्वारा राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी के विरुद्ध उठाए गए अत्यंत कठोर कदम के पश्चात, अब देश के प्रमुख विपक्षी दल ने ममता बनर्जी का खुलकर समर्थन किया है। प्राप्त आधिकारिक राजनीतिक समाचारों के अनुसार, भारत निर्वाचन आयोग द्वारा तृणमूल कांग्रेस का नाम और चिह्न ज़ब्त (फ्रीज) किए जाने के बाद कांग्रेस पार्टी ने ममता का मजबूती से समर्थन किया है। यह राजनीतिक समर्थन इस बात का स्पष्ट संकेत है कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन (इंडिया ब्लॉक) अभी भी पूरी तरह से एकजुट है और वे इसे संवैधानिक संस्थाओं के कथित दुरुपयोग के रूप में देख रहे हैं।

तृणमूल कांग्रेस, जिसने पिछले एक दशक से अधिक समय से पश्चिम बंगाल की सत्ता पर निर्विवाद रूप से शासन किया है, वर्तमान में विद्रोही गुटों के कारण अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है। इसी आंतरिक कलह को आधार बनाकर निर्वाचन आयोग ने पार्टी के ऐतिहासिक चुनाव चिह्न को अस्थायी रूप से ज़ब्त कर लिया है। इस निर्णय की गूंज देश की राजधानी दिल्ली तक सुनाई दी है। बीस सितंबर, दो हज़ार छब्बीस को शिव सहाय सिंह द्वारा प्रकाशित इस रिपोर्ट के अनुसार, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने तृणमूल कांग्रेस के नाम और चिह्न को ज़ब्त करने के लिए भारत निर्वाचन आयोग की कड़ी आलोचना की है।

कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का यह मानना है कि चुनाव आयोग का यह निर्णय अत्यंत जल्दबाज़ी में और राजनीति से प्रेरित होकर लिया गया है। कांग्रेस नेताओं ने इस बात पर विशेष रूप से ज़ोर दिया कि इस पार्टी की स्थापना स्वयं ममता बनर्जी ने अठाईस वर्ष पूर्व की थी। अठाईस वर्षों के अथक परिश्रम, जमीनी संघर्ष और अपार जनसमर्थन से खड़ी की गई एक विशाल राजनीतिक संस्था के नाम और चुनाव चिह्न को कुछ असंतुष्ट विधायकों के आधारहीन दावों पर ज़ब्त कर लेना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के भी पूर्णतः विरुद्ध है। संलग्न चित्र में लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को मीडिया को संबोधित करते हुए और इस मुद्दे पर अपनी पार्टी का दृढ़ वैचारिक रुख स्पष्ट करते हुए देखा जा सकता है।

यह राजनीतिक घटनाक्रम इसलिए भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच अतीत में कई गहरे राजनीतिक मतभेद रहे हैं। परंतु, जब बात एक स्थापित क्षेत्रीय दल के अस्तित्व और निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर आती है, तो कांग्रेस ने अपने वैचारिक मतभेदों को किनारे रखकर ममता बनर्जी के साथ खड़े होने का रणनीतिक निर्णय लिया है। विपक्षी दलों का यह साझा आरोप है कि केंद्र सरकार संवैधानिक संस्थाओं का उपयोग करके विपक्ष-शासित राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने का कुत्सित प्रयास कर रही है।

आगामी विधानसभा उपचुनावों को देखते हुए तृणमूल कांग्रेस के लिए बिना अपने स्थापित चुनाव चिह्न के मतदाताओं के बीच जाना एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य होगा। भारत के ग्रामीण और दूरस्थ मतदाताओं के लिए चुनाव चिह्न ही पार्टी की सबसे बड़ी पहचान होती है। कांग्रेस का यह नैतिक और राजनीतिक समर्थन ममता बनर्जी के लिए इस संकट की घड़ी में एक बड़ी राहत का कार्य करेगा। अब यह देखना अत्यंत दिलचस्प होगा कि ममता बनर्जी का विधिक दल सर्वोच्च न्यायालय में इस लड़ाई को किस प्रकार आगे बढ़ाता है और क्या चुनाव आयोग अपने इस विवादास्पद निर्णय पर पुनर्विचार करेगा।