‘जेम ग्रेनाइट्स’ के मालिक वीरमणि के खिलाफ POCSO एक्ट के तहत केस: जांच के लिए ‘सभी महिला SIT’ का गठन

सरिता त्रिपाठी
तमिलनाडु सरकार ने जेम ग्रेनाइट्स के संस्थापक आर. वीरमणि से जुड़े सनसनीखेज POCSO (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) एक्ट मामले की गहन जांच के लिए पूरी तरह से महिलाओं वाली एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया है।
तमिलनाडु में एक बहुत बड़ा और रोंगटे खड़े कर देने वाला विवाद सामने आया है। राज्य सरकार ने 84 वर्षीय प्रभावशाली उद्योगपति और ‘जेम ग्रेनाइट्स’ के संस्थापक आर. वीरमणि पर लगे नाबालिग बच्चियों के यौन शोषण के सनसनीखेज आरोपों की जांच करने के लिए एक ‘सभी महिला विशेष जांच दल’ (SIT) का गठन किया है। पुलिस महानिदेशक (DGP) महेश कुमार अग्रवाल ने शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 को इस संबंध में कड़े आदेश जारी किए, जिसमें स्पष्ट किया गया कि यह SIT इस मामले और इससे जुड़े अन्य पहलुओं की “प्रभावी जांच” करेगी।
इस हाई-प्रोफाइल SIT का नेतृत्व चेन्नई की केंद्रीय अपराध शाखा (CCB) की अतिरिक्त पुलिस आयुक्त पी. सी. थेनमोझी करेंगी। इस टीम में कानून और व्यवस्था (पश्चिम) की संयुक्त पुलिस आयुक्त दिशा मित्तल, पुलिस अधीक्षक जे. मुथरासी और महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध शाखा की पुलिस उपायुक्त वी. वी. गीतांजलि शामिल हैं। यह विशेष टीम सीधे चेन्नई के पुलिस आयुक्त ए. अमलराज की सख्त निगरानी में काम करेगी।
यह पूरा मामला अक्टूबर 2025 में तब प्रकाश में आया, जब केंद्रीय अपराध शाखा के पास एक अनाम पेन ड्राइव पहुंची। इस पेन ड्राइव में एक वीडियो था, जिसमें कथित तौर पर वीरमणि को एक नाबालिग बच्ची के साथ यौन उत्पीड़न करते हुए देखा गया था। पुलिस ने शुरुआती जांच के बाद फरवरी 2026 में बच्ची की पहचान न हो पाने का हवाला देते हुए केस को बंद करने (क्लोजर रिपोर्ट) की कोशिश की थी, लेकिन एक विशेष POCSO अदालत ने इसे खारिज कर दिया और व्यापक जांच के आदेश दिए। इस आदेश के बाद पुलिस ने कई पीड़ित बच्चियों की पहचान की और 29 अगस्त 2026 को वीरमणि और उनके दो सहयोगियों (शांति और महेंद्र सिम्हन) को गिरफ्तार कर लिया। शुक्रवार को एक विशेष POCSO अदालत ने सुरक्षा कारणों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए वीरमणि की न्यायिक हिरासत 9 अक्टूबर 2026 तक बढ़ा दी है।
इस रूह कंपा देने वाले मामले ने तमिलनाडु की राजनीति और पुलिस महकमे में भारी भूचाल ला दिया है। पुलिस पर नवंबर 2024 से शिकायत होने के बावजूद कार्रवाई न करने का गंभीर आरोप है। इस मामले में लापरवाही के चलते सरकार ने चेन्नई के तत्कालीन पुलिस आयुक्त ए. अरुण सहित दो वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों को उनके पदों से हटाकर “अनिवार्य प्रतीक्षा” (कंपलसरी वेट) में डाल दिया है। मद्रास उच्च न्यायालय ने भी इस मामले में दखल देते हुए मीडिया को पीड़ित बच्चियों की पहचान उजागर करने या जांच की बारीकियों पर चर्चा करने से सख्त रोक लगा दी है, और SIT को जांच की जानकारी देने के लिए साप्ताहिक प्रेस विज्ञप्ति जारी करने का आदेश दिया है।