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यूपी विधानसभा चुनाव: 150 सीटों पर कड़े मोलभाव की तैयारी में कांग्रेस, सपा की बढ़ सकती हैं मुश्किलें

Lucknow : उत्तर प्रदेश की राजनीति में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर अभी से सियासी पारा चढ़ने लगा है। राज्य में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर तस्वीर भले ही शुरुआती दौर में हो, लेकिन सीटों के बंटवारे पर बड़ा पेंच फंसना तय माना जा रहा है। कांग्रेस पार्टी ने इस बार पूरी रणनीति के तहत अपनी जमीन तैयार करनी शुरू कर दी है और समाजवादी पार्टी के सामने कड़े मोलभाव का प्लान बना लिया है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस ने राज्य की कुल 403 विधानसभा सीटों में से उन 150 सीटों की सूची तैयार कर ली है जहां उसका विशेष प्रभाव है या फिर सपा के वोट बैंक के साथ जुड़ने से जीत की प्रबल संभावना बन जाती है।तीन श्रेणियों में बंटी सीटें और सौ सीटों से नीचे समझौता नहींकांग्रेस पार्टी ने अपनी चुनावी रणनीति के तहत उत्तर प्रदेश की सभी 403 सीटों को मुख्य रूप से तीन अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया है। इनमें से खास तौर पर ऐसी 150 सीटों को चिन्हित किया गया है जहां ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम मतदाताओं की संख्या निर्णायक स्थिति में है। पार्टी की अंदरूनी रणनीति के तहत शुरुआत में सपा के सामने 150 सीटों का प्रस्ताव रखा जाएगा, लेकिन फाइनल नेगोशिएशन में पार्टी सौ सीटों से किसी भी कीमत पर कम पर समझौता करने के मूड में नहीं है। पार्टी नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि इस बार राज्य में सम्मानजनक संख्या में सीटों पर चुनाव लड़ा जाएगा ताकि कार्यकर्ताओं का मनोबल बना रहे।सपा को अपनी ताकत का अहसास कराएगी कांग्रेसगठबंधन की बातचीत से ठीक पहले कांग्रेस ने सपा पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना शुरू कर दिया है। इसके लिए पार्टी के चर्चित मुस्लिम चेहरों जैसे इमरान प्रतापगढ़ी और इमरान मसूद को मैदान में पूरी तरह सक्रिय कर दिया गया है। कांग्रेस के रणनीतिकारों का तर्क है कि हालिया लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के साथ आने से ही समाजवादी पार्टी को बड़ा फायदा मिला था और पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया था। इसके विपरीत जब सपा ने अकेले या अन्य दलों के साथ चुनाव लड़ा था, तब उसे वैसा परिणाम नहीं मिला था। कांग्रेस का मानना है कि राहुल गांधी की न्याय यात्रा और उनकी नीतियों के बाद दलितों, पिछड़ों, मुसलमानों के साथ-साथ ब्राह्मण समुदाय का एक धड़ा भी पार्टी की तरफ आकर्षित हुआ है, इसलिए सपा उन्हें केवल एक प्रतीकात्मक सहयोगी के तौर पर नहीं देख सकती।ओवैसी और चंद्रशेखर की एंट्री से सपा की बढ़ी चिंताइस पूरे सियासी समीकरण के बीच समाजवादी पार्टी के सामने ओवैसी और चंद्रशेखर आजाद की पार्टियों की सक्रियता भी एक बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि यूपी चुनाव में सपा और कांग्रेस का गठबंधन समय रहते और मजबूत स्थिति में नहीं उतरा, तो मुस्लिम और दलित वोटों के बिखरने का खतरा काफी बढ़ जाएगा। असदुद्दीन ओवैसी और चंद्रशेखर आजाद जैसे नेता कई सीटों पर अपने गठबंधन के जरिए वोटों के समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में सपा और कांग्रेस का साथ आना मुस्लिम और पिछड़े वोटों के बिखराव को रोकने के लिए बेहद जरूरी है। यही वजह है कि कांग्रेस को पूरा भरोसा है कि सपा इन तमाम जमीनी सच्चाइयों को ध्यान में रखते हुए उन्हें चुनाव में उम्मीद से बेहतर और सम्मानजनक हिस्सेदारी देगी।