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सड़क के इंतजार में घुट-घुट कर जीने को मजबूर जवादु हिल्स के आदिवासी, 4.11 करोड़ की योजना फाइलों में कैद होने पर फूटा भारी गुस्सा

राघवेंद्र प्रताप सिंह

तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई में स्थित दुर्गम जवादु पहाड़ियों पर रहने वाले हजारों आदिवासियों का धैर्य अब जवाब दे चुका है। कानामलई गांव के निवासियों ने नई वन सड़क के निर्माण में हो रही भयंकर देरी के खिलाफ कड़ा विरोध प्रदर्शन करते हुए सीधे प्रशासन और लालफीताशाही पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई जिले की दुर्गम पहाड़ियों (जवादु हिल्स) पर बसे आदिवासी परिवारों का दर्द अब एक भयंकर आक्रोश में बदल चुका है। कानामलई नामक सुदूर आदिवासी गांव और उसके अधीन आने वाले बत्तीस छोटे टोलों (जैसे एझुथम्पट्टू, नीपथुरई और अरासनूर) के हजारों निवासियों ने नई वन सड़क के निर्माण में हो रही जानलेवा देरी के खिलाफ अपना सबसे कड़ा और उग्र विरोध दर्ज कराया है। करीब तीन हजार की आबादी वाले इस इलाके के लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। ग्रामीणों का सीधा और आक्रामक आरोप है कि सरकारी उदासीनता और वन विभाग की लेटलतीफी के कारण वे आज भी बाहरी दुनिया से कटे हुए हैं और आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित होकर हर दिन मौत के साये में जीने को पूरी तरह से मजबूर हैं।

इस भारी विवाद की मुख्य जड़ पडवेडु और शेनबागाथोप्पु गांवों के बीच बनने वाली छह दशमलव सात किलोमीटर लंबी वह अहम वन सड़क है, जिसे राज्य सरकार ने साल दो हजार पच्चीस में ही चार करोड़ ग्यारह लाख रुपये की भारी भरकम लागत के साथ मंजूरी दे दी थी। ग्रामीणों का दर्द है कि सड़क न होने के कारण किसी के गंभीर रूप से बीमार पड़ने पर, खासकर बच्चों और गर्भवती महिलाओं को, दस किलोमीटर दूर स्थित कलसमुद्रम या पडवेडु के सरकारी अस्पताल तक खटिया पर लादकर या दुर्गम रास्तों से पैदल ही ले जाना पड़ता है। गांव में सिर्फ एक प्राथमिक विद्यालय है, जिससे बड़ी कक्षाओं के बच्चों को बारह किलोमीटर दूर अनंतपुरम गांव तक खतरनाक पहाड़ी रास्तों को हर दिन पैदल नापना पड़ता है। बारिश और मानसून के समय हालात इतने खौफनाक हो जाते हैं कि कच्चा और दलदली रास्ता होने के कारण न तो कोई स्वास्थ्य कार्यकर्ता वहां पहुंच पाता है और न ही राशन की दुकानों तक सरकारी अनाज पहुंच पाता है।

इस पूरे बवाल पर वन विभाग के अधिकारियों ने अपनी धीमी कार्यप्रणाली का बचाव करते हुए कहा है कि यह नई सड़क पूरी तरह से पक्की और लगभग पौने चार मीटर चौड़ी बनाई जानी है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना में जलभराव को रोकने के लिए विशेष पुलिया और पहाड़ों के चार खतरनाक मोड़ों पर मजबूत सुरक्षा दीवारें भी बननी हैं। अधिकारियों का तर्क है कि हाल ही में हुए साल दो हजार छब्बीस के विधानसभा चुनावों के बाद इस सड़क की फाइल को अंतिम मंजूरी के लिए दोबारा राज्य सरकार के पास भेजा गया है, जो अभी तक सरकारी दफ्तरों में अटकी हुई है। हालांकि, जिला कलेक्टर और जिला वन अधिकारी को आदिवासियों की इस आपातकालीन स्थिति से पूरी तरह अवगत करा दिया गया है। लेकिन फाइलों में कैद इस परियोजना और लालफीताशाही के घिनौने खेल ने आदिवासियों के गुस्से को उस उबलते हुए ज्वालामुखी पर पहुंचा दिया है, जहां अब वे अपने संवैधानिक हक के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ने को तैयार हैं।