दुष्कर्म के मामलों में न्याय का लंबा इंतजार: अदालतों में लंबित मुकदमों का अंबार, सजा की दर तीस प्रतिशत से भी नीचे

सरिता त्रिपाठी
देश भर में महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराधों के बाद न्याय मिलने की प्रक्रिया गंभीर रूप से धीमी बनी हुई है। एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, जांच और अदालती प्रक्रिया में देरी के कारण दो लाख से अधिक मामले अभी भी लंबित हैं और अपराधियों को सजा मिलने की दर चिंताजनक रूप से गिर गई है।
देश में महिलाओं की सुरक्षा और आपराधिक न्याय प्रणाली की वास्तविक स्थिति को लेकर एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। नवीनतम आंकड़ों ने इस कड़वे सच को उजागर कर दिया है कि दुष्कर्म जैसे जघन्य और गंभीर अपराधों में भी पीड़ितों को न्याय के लिए एक बहुत लंबा और थका देने वाला संघर्ष करना पड़ रहा है। देश की विभिन्न अदालतों में ऐसे मुकदमों का अंबार लगातार बढ़ता जा रहा है, और नए मामलों के दर्ज होने के मुकाबले पुराने मुकदमों के निपटारे की गति अत्यधिक धीमी है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के हालिया आंकड़ों के विस्तृत विश्लेषण से यह साफ हो गया है कि कड़े कानूनों और त्वरित न्याय के तमाम दावों के बावजूद अदालतों में लंबित मामलों की संख्या दो लाख के गंभीर आंकड़े को पार कर गई है। यह स्थिति न केवल न्याय प्रणाली की कार्यक्षमता पर सवाल खड़े करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि कानूनी प्रक्रिया की सुस्ती का सीधा फायदा अपराधियों को मिल रहा है।
मुकदमों की सुनवाई और सजा की दर से जुड़े आंकड़े और भी अधिक निराशाजनक हैं। अदालतों में जाने वाले मुकदमों में से केवल दो प्रतिशत ही ऐसे होते हैं जिनमें उसी साल के भीतर फैसला सुनाया जा सके और दोषियों को सजा मिल सके। कुल मिलाकर देश की अदालतों में नब्बे प्रतिशत से अधिक मामले साल के अंत तक बिना किसी फैसले के लंबित रह जाते हैं। इसके अलावा, जिन मुकदमों में सुनवाई पूरी हो जाती है, उनमें से करीब अड़सठ प्रतिशत मामलों में आरोपी अदालत से बरी हो जाते हैं, जबकि सजा की कुल दर महज चौबीस प्रतिशत के आसपास सिमट कर रह गई है। कानून के जानकारों का मानना है कि सुनवाई में होने वाली इस अत्यधिक देरी के कारण ही गवाह टूट जाते हैं या उन्हें डराना-धमकाना आसान हो जाता है, जिससे अंततः पीड़ित न्याय से वंचित रह जाते हैं। वर्तमान में देश भर में हर दिन औसतन चौरासी नए मामले पुलिस में दर्ज हो रहे हैं, लेकिन न्याय की सुस्त रफ्तार पीड़ितों का मनोबल तोड़ रही है।
इस पूरी व्यवस्थागत विफलता का मुख्य कारण न्यायपालिका पर अत्यधिक दबाव और जांच एजेंसियों के पास संसाधनों का भारी अभाव है। साल दो हजार बारह के बहुचर्चित सामूहिक दुष्कर्म कांड के बाद आपराधिक कानूनों में कई सख्त संशोधन किए गए थे और पुलिस जांच से लेकर अदालती कार्यवाही तक के लिए एक निश्चित समय सीमा तय की गई थी। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बुनियादी ढांचे के बिना केवल कानून कड़े कर देने से न्याय की गति में कोई सुधार नहीं आया है। अदालतों में न्यायाधीशों की भारी कमी, वैज्ञानिक साक्ष्यों को जांचने वाली प्रयोगशालाओं पर अत्यधिक बोझ और गवाहों की सुरक्षा के लचर इंतजामों ने पूरी प्रक्रिया को धीमा कर दिया है। न्यायविदों का स्पष्ट मत है कि जब तक त्वरित अदालतों की संख्या बढ़ाकर उन्हें पूरी तरह से सक्रिय नहीं किया जाता और न्यायिक प्रक्रिया की बाधाओं को दूर नहीं किया जाता, तब तक कड़े कानून भी पीड़ितों को समय पर न्याय दिलाने में पूरी तरह से विफल साबित होते रहेंगे।